mire KHuda mujhe vo taab-e-nay-nawaai de | मिरे ख़ुदा मुझे वो ताब-ए-नय-नवाई दे

  - Obaidullah Aleem

मिरे ख़ुदा मुझे वो ताब-ए-नय-नवाई दे
मैं चुप रहूँ भी तो नग़्मा मिरा सुनाई दे

गदा-ए-कू-ए-सुख़न और तुझ से क्या माँगे
यही कि मम्लिकत-ए-शेर की ख़ुदाई दे

निगाह-ए-दहर में अहल-ए-कमाल हम भी हों
जो लिख रहे हैं वो दुनिया अगर दिखाई दे

छलक न जाऊँ कहीं मैं वजूदस अपने
हुनर दिया है तो फिर ज़र्फ़-ए-किबरियाई दे

मुझे कमाल-ए-सुख़न से नवाज़ने वाले
समाअतों को भी अब ज़ौक़-ए-आश्नाई दे

नुमू-पज़ीर है ये शोला-ए-नवा तो इसे
हर आने वाले ज़माने की पेशवाई दे

कोई करे तो कहाँ तक करे मसीहाई
कि एक ज़ख़्म भरे दूसरा दुहाई दे

मैं एक से किसी मौसम में रह नहीं सकता
कभी विसाल कभी हिज्र से रिहाई दे

जो एक ख़्वाब का नश्शा हो कम तो आँखों को
हज़ार ख़्वाब दे और जुरअत-ए-रसाई दे

  - Obaidullah Aleem

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