भीड़ में हमारी तन्हाई कौन समझता है
ख़ुद से ख़ुद की लड़ाई कौन समझता है
हम दरिया थे जी भर कर सबने प्यास बुझाई
जब प्यास बुझ जाए गहराई कौन समझता है
सब की आँखों ने तो हमें पागल ही समझा है
ज़िस्म से जान की जुदाई कौन समझता है
जो था हक़ीम वहीं था मेरा क़ातिल भी मगर
हाथों में हैं ज़हर या दवाई कौन समझता है
लोगों ने कहाँ था भरोसे पर दुनिया क़ाएम है
मगर ईधर कुआ उधर खाई कौन समझता है
— Praveen Bhardwaj















