सवाल छोड़ कि हालत ये क्यूँँ बनाई है

उसे न सुन जो कहानी सुनी-सुनाई है

पतंगा शम्अ'' पे मरता है क्या बुराई है
उसे किसी ने भी रोका है जिस की आई है

हँसे हैं गुल न कली कोई मुस्कुराई है
हुज़ूर कैसे ये कह दूँ बहार आई है

ज़रूर कोई अलामत क़ज़ा की पाई है
मुझे अज़ीज़ों ने सूरत तिरी दिखाई है

न जाने हिज्र की रात और मिरी सियह-बख़्ती
कहाँ कहाँ के अँधेरे समेट लाई है

लहद से कब उठें देखो मुसाफ़िरान-ए-अदम
सफ़र है दूर का रस्ते में नींद आई है

असीर क्या कहें सय्याद ये तो समझा दे
क़फ़स में बू-ए-चमन पूछने को आई है

मुझे न छेड़ क़यामत है मेरी आहों में
ख़ुदा रखे तिरी महफ़िल सजी-सजाई है

— Qamar Jalalvi

More by Qamar Jalalvi

Other ghazal from the same pen

See all from Qamar Jalalvi →

Raat Shayari

Shers of raat.

All Raat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling