Qamar Jalalvi

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Qamar Jalalvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Qamar Jalalvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

बस इतनी सी दूरी ये मैं हूँ ये मंज़िल कहाँ आ के फूटे हैं पाँव के छाले — Qamar Jalalvi
ज़रा रूठ जाने पे इतनी ख़ुशामद 'क़मर' तुम बिगाड़ोगे आदत किसी की — Qamar Jalalvi
ज़ब्त करता हूँ तो घुटता है क़फ़स में मिरा दम आह करता हूँ तो सय्याद ख़फ़ा होता है — Qamar Jalalvi

Ghazal

ऐ मेरे हम-नशीं चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं बात होती गुलों तक तो सह लेते हम अब तो काँटों पे भी हक़ हमारा नहीं आज आए हो तुम कल चले जाओगे ये मोहब्बत को अपनी गवारा नहीं उम्र भर का सहारा बनो तो बनो दो घड़ी का सहारा सहारा नहीं दी सदा दार पर और कभी तूर पर किस जगह मैं ने तुम को पुकारा नहीं ठोकरें यूँँ खिलाने से क्या फ़ाएदा साफ़ कह दो कि मिलना गवारा नहीं गुल्सिताँ को लहू की ज़रूरत पड़ी सब से पहले ही गर्दन हमारी कटी फिर भी कहते हैं मुझ से ये अहल-ए-चमन ये चमन है हमारा तुम्हारा नहीं ज़ालिमो अपनी क़िस्मत पे नाज़ाँ न हो दौर बदलेगा ये वक़्त की बात है वो यक़ीनन सुनेगा सदाएँ मिरी क्या तुम्हारा ख़ुदा है हमारा नहीं अपनी ज़ुल्फ़ों को रुख़ से हटा लीजिए मेरा ज़ौक़-ए-नज़र आज़मा लीजिए आज घर से चला हूँ यही सोच कर या तो नज़रें नहीं या नज़ारा नहीं जाने किस की लगन किस के धुन में मगन हम को जाते हुए मुड़ के देखा नहीं हम ने आवाज़ पर तुम को आवाज़ दी फिर भी कहते हैं हम ने पुकारा नहीं — Qamar Jalalvi
तिरे निसार न देखी कोई ख़ुशी मैं ने कि अब तो मौत को समझा है ज़िंदगी मैं ने ये दिल में सोच के तौबा भी तोड़ दी मैं ने न जाने क्या कहे साक़ी अगर न पी मैं ने कोई बला मिरे सर पर ज़रूर आएगी कि तेरी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ सँवार दी मैं ने सहर हुई शब-ए-वा'दा का इज़्तिराब गया सितारे छुप गए गुल कर दी रौशनी मैं ने सिवाए दिल मुझे दैर-ओ-हरम से क्या मतलब जगह हुज़ूर के मिलने की ढूँड ली मैं ने जहाँ चला दिया साग़र का दौर ऐ वाइ'ज़ वहीं पे गर्दिश-ए-अय्याम रोक दी मैं ने बलाएँ लेने पे आप इतने हो गए बरहम हुज़ूर कौन सी जागीर छीन ली मैं ने दुआएँ दो मुझे दर दर जुनूँ में फिर फिर कर तुम्हारी शोहरतें कर दीं गली मैं ने जवाब उस का तो शायद फ़लक भी दे न सके वो बंदगी जो तिरी रहगुज़र में की मैं ने वो जाने कैसे पता दे गए थे गुलशन का न छोड़ा फूल न छोड़ी कली कली मैं ने 'क़मर' वो नींद में थे उन को क्या ख़बर होगी कि उन पे शब को लुटाई है चाँदनी मैं ने — Qamar Jalalvi
तुझे क्या नासेहा अहबाब ख़ुद समझाए जाते हैं इधर तू खाए जाता है उधर वो खाए जाते हैं चमन वालों से जा कर ऐ नसीम-ए-सुब्ह कह देना असीरान-ए-क़फ़स के आज पर कटवाए जाते हैं कहीं बेड़ी अटकती है कहीं ज़ंजीर उलझती है बड़ी मुश्किल से दीवाने तिरे दफ़नाए जाते हैं उन्हें ग़ैरों के घर देखा है और इनकार है उन को मैं बातें पी रहा हूँ और वो क़स में खाए जाते हैं ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे नाला-हा-ए-शाम-ए-फ़ुर्क़त से ज़मीं भी काँपती है आसमाँ थर्राए जाते हैं कोई दम अश्क थमते ही नहीं ऐसा भी क्या रोना 'क़मर' दो-चार दिन की बात है वो आए जाते हैं — Qamar Jalalvi
यूँँ तुम्हारे ना-तवान-ए-शौक़ मंज़िल भर चले खाई ठोकर गिर पड़े गिर कर उठे उठ कर चले छोड़ कर बीमार को ये क्या क़यामत कर चले दम निकलने भी न पाया आप अपने घर चले हो गया सय्याद बरहम ऐ असीरान-ए-क़फ़स बंद अब ये नाला-ओ-फ़रियाद वर्ना पर चले किस तरह तय की है मंज़िल इश्क़ की हम ने न पूछ थक गए जब पाँव तेरा नाम ले ले कर चले आ रहे हैं अश्क आँखों में अब ऐ साक़ी न छेड़ बस छलकने की कसर बाक़ी है साग़र भर चले जब भी ख़ाली हाथ थे और अब भी ख़ाली हाथ हैं ले के हम दुनिया में क्या आए थे क्या ले कर चले हुस्न को ग़मगीन देखे इश्क़ ये मुमकिन नहीं रोक ले ऐ शम्अ' आँसू अब पतिंगे मर चले इस तरफ़ भी इक नज़र हम भी खड़े हैं देर से माँगने वाले तुम्हारे दर से झोली भर चले ऐ 'क़मर' शब ख़त्म होने को है छोड़ो इंतिज़ार साहिल-ए-शब से सितारे भी किनारा कर चले — Qamar Jalalvi
ब-जुज़ तुम्हारे किसी से कोई सवाल नहीं कि जैसे सारे ज़माने से बोल-चाल नहीं ये सोचता हूँ कि तू क्यूँँ नज़र नहीं आता मिरी निगाह नहीं या तिरा जमाल नहीं तजाहुल अपनी जफ़ाओं पे और महशर में ख़ुदा के सामने कहते हो तुम ख़याल नहीं ये कह के जल्वे से बेहोश हो गए मूसा निगाह उस से मिलाऊँ मिरी मजाल नहीं मैं हर बहार-ए-गुलिस्ताँ पे ग़ौर करता हूँ जला न हो मिरा घर ऐसा कोई साल नहीं ख़ता मुआ'फ़ कि सरकार मुँह पे कहता हूँ बग़ैर आईना कह लो मिरी मिसाल नहीं मैं चाँदनी में बुलाता तो हूँ वो कह देंगे 'क़मर' तुम्हें मिरी रुस्वाई का ख़याल नहीं — Qamar Jalalvi
लहद और हश्र में ये फ़र्क़ कम पाए नहीं जाते यहाँ धूप आ नहीं सकती वहाँ साए नहीं जाते किसी महफ़िल में भी ऐसे चलन पाए नहीं जाते कि बुलवाए हुए मेहमान उठवाए नहीं जाते ज़मीं पर पाऊँ रखने दे उन्हें ऐ नाज़-ए-यकताई कि अब नक़्श-ए-क़दम उन के कहीं पाए नहीं जाते तुझे ऐ दीदा-ए-तर फ़िक्र क्यूँँ है दिल के ज़ख़्मों की कि बे-शबनम के भी ये फूल मुरझाए नहीं जाते जुनूँ वालों को क्या समझाओगे ये वो ज़माना है ख़िरद वाले ख़िरद वालों से समझाए नहीं जाते वक़ार-ए-इश्क़ यूँँ भी शम्अ' की नज़रों में कुछ कम है पतिंगे ख़ुद चले आते हैं बुलवाए नहीं जाते फ़ज़ीलत है ये इंसाँ की वहाँ तक जा पहुँचता है फ़रिश्ते क्या फ़रिश्तों के जहाँ साए नहीं जाते बस इतनी बात पर छीनी गई है रहबरी हम से कि हम से कारवाँ मंज़िल पे लुटवाए नहीं जाते 'क़मर' की सुब्ह-ए-फ़ुर्क़त पूछिए सूरज की किरनों से सितारे तो गवाही के लिए आए नहीं जाते — Qamar Jalalvi
तौबा कीजे अब फ़रेब-ए-दोस्ती खाएँगे क्या आज तक पछता रहे हैं और पछताएँगे क्या ख़ुद समझिए ज़ब्ह होने वाले समझाएँगे क्या बात पहुँचेगी कहाँ तक आप कहलाएँगे क्या बज़्म-ए-कसरत में ये क्यूँँ होता है उन का इंतिज़ार पर्दा-ए-वहदत से वो बाहर निकल आएँगे क्या कल बहार आएगी ये सुन कर क़फ़स बदलो न तुम रात भर में क़ैदियों के पर निकल आएँगे क्या ऐ दिल-ए-मुज़्तर इन्हीं बातों से छूटा था चमन अब तिरे नाले क़फ़स से भी निकलवाएँगे क्या ऐ क़फ़स वालो रिहाई की तमन्ना है फ़ुज़ूल फ़स्ल-ए-गुल आने से पहले पर न कट जाएँगे क्या शाम-ए-ग़म जल जल के मिस्ल-ए-शम्अ हो जाऊँगा ख़त्म सुब्ह को अहबाब आएँगे तो दफ़नाएँगे क्या जानता हूँ फूँक देगा मेरे घर को बाग़बाँ आशियाँ के पास वाले फूल रह जाएँगे क्या उन की महफ़िल में चला आया है दुश्मन ख़ैर हो मिस्ल-ए-आदम हम भी जन्नत से निकल जाएँगे क्या नाख़ुदा मौजों में कश्ती है तो हो हम को न देख जिन को तूफ़ानों ने पाला है वो घबराएँगे क्या तू ने तूफ़ाँ देखते ही क्यूँँ निगाहें फेर लीं नाख़ुदा ये अहल-ए-कश्ती डूब ही जाएँगे क्या क्यूँँ ये बैरून-ए-चमन जलते हुए तिनके गए मेरे घर की आग दुनिया भर में फैलाएँगे क्या कोई तो मूनिस रहेगा ऐ 'क़मर' शाम-ए-फ़िराक़ शम्अ' गुल होगी तो ये तारे भी छुप जाएँगे क्या — Qamar Jalalvi
अगर छूटा भी उस से आइना-ख़ाना तो क्या होगा वो उलझे ही रहेंगे ज़ुल्फ़ में शाना तो क्या होगा भला अहल-ए-जुनूँ से तर्क वीराना तो क्या होगा ख़बर आएगी उन की उन का अब आना तो क्या होगा सुने जाओ जहाँ तक सुन सको जब नींद आएगी वहीं हम छोड़ देंगे ख़त्म अफ़्साना तो क्या होगा अँधेरी रात ज़िंदाँ पाँव में ज़ंजीर-ए-तन्हाई इस आलम में मर जाएगा दीवाना तो क्या होगा अभी तो मुतमइन हो ज़ुल्म का पर्दा है ख़ामोशी अगर कुछ मुँह से बोल उठ्ठा ये दीवाना तो क्या होगा जनाब-ए-शैख़ हम तो रिंद हैं चुल्लू सलामत है जो तुम ने तोड़ भी डाला ये पैमाना तो क्या होगा यही है गर ख़ुशी तो रात भर गिनते रहो तारे 'क़मर' इस चाँदनी में उन का अब आना तो क्या होगा — Qamar Jalalvi
देखिए हो गई बदनाम मसीहाई भी हम न कहते थे कि टलती है कहीं आई भी हुस्न ख़ुद्दार हो तो बाइस-ए-शोहरत है ज़रूर लेकिन इन बातों में हो जाती है रुस्वाई भी सैंकड़ों रंज ओ अलम दर्द ओ मुसीबत शब-ए-ग़म कितनी हंगामा-तलब है मिरी तन्हाई भी तुम भी दीवाने के कहने का बुरा मान गए होश की बात कहीं करते हैं सौदाई भी बाल ओ पर देख तो लो अपने असीरान-ए-क़फ़स क्या करोगे जो गुलिस्ताँ में बहार आई भी पाँव वहशत में कहीं रुकते हैं दीवानों के तोड़ डालेंगे ये ज़ंजीर जो पहनाई भी ऐ मिरे देखने वाले तिरी सूरत पे निसार काश होती तेरी तस्वीर में गोयाई भी ऐ 'क़मर' वो न हुई देखिए तक़दीर की बात चाँदनी रात जो क़िस्मत से कभी आई भी — Qamar Jalalvi
कब मेरा नशेमन अहल-ए-चमन गुलशन में गवारा करते हैं ग़ुंचे अपनी आवाज़ों में बिजली को पुकारा करते हैं अब नज़्अ' का आलम है मुझ पर तुम अपनी मोहब्बत वापस लो जब कश्ती डूबने लगती है तो बोझ उतारा करते हैं जाती हुई मय्यत देख के भी वल्लाह तुम उठ के आ न सके दो चार क़दम तो दुश्मन भी तकलीफ़ गवारा करते हैं बे-वजह न जाने क्यूँँ ज़िद है उन को शब-ए-फ़ुर्क़त वालों से वो रात बढ़ा देने के लिए गेसू को सँवारा करते हैं पोंछो न अरक़ रुख़्सारों से रंगीनी-ए-हुस्न को बढ़ने दो सुनते हैं कि शबनम के क़तरे फूलों को निखारा करते हैं कुछ हुस्न ओ इश्क़ में फ़र्क़ नहीं है भी तो फ़क़त रुस्वाई का तुम हो कि गवारा कर न सके हम हैं कि गवारा करते हैं तारों की बहारों में भी 'क़मर' तुम अफ़्सुर्दास रहते हो फूलों को तो देखो काँटों में हँस हँस के गुज़ारा करते हैं — Qamar Jalalvi
ये दर्द-ए-हिज्र और इस पर सहर नहीं होती कहीं इधर की तो दुनिया उधर नहीं होती न हो रिहाई क़फ़स से अगर नहीं होती निगाह-ए-शौक़ तो बे-बाल-ओ-पर नहीं होती सताए जाओ नहीं कोई पूछने वाला मिटाए जाओ किसी को ख़बर नहीं होती निगाह-ए-बर्क़ अलावा मिरे नशेमन के चमन की और किसी शाख़ पर नहीं होती क़फ़स में ख़ौफ़ है सय्याद का न बर्क़ का डर कभी ये बात नसीब अपने घर नहीं होती मनाने आए हो दुनिया में जब से रूठ गया ये ऐसी बात है जो दर-गुज़र नहीं होती फिरूंगा हश्र में किस किस से पूछता तुम को वहाँ किसी को किसी की ख़बर नहीं होती किसी ग़रीब के नाले हैं आप क्यूँँ चौंके हुज़ूर शब को अज़ान-ए-सहर नहीं होती ये माना आप क़सम खा रहे हैं वा'दों पर दिल-ए-हज़ीं को तसल्ली मगर नहीं होती तुम्हीं दुआएँ करो कुछ मरीज़-ए-ग़म के लिए कि अब किसी की दुआ कार-गर नहीं होती बस आज रात को तीमारदार सो जाएँ मरीज़ अब न कहेगा सहर नहीं होती 'क़मर' ये शाम-ए-फ़िराक़ और इज़तिराब-ए-सहर अभी तो चार-पहर तक सहर नहीं होती — Qamar Jalalvi
बला से हो शाम की सियाही कहीं तो मंज़िल मिरी मिलेगी उधर अँधेरे में चल पड़ूँगा जिधर मुझे रौशनी मिलेगी हुजूम-ए-महशर में कैसा मिलना नज़र-फ़रेबी बड़ी मिलेगी किसी से सूरत तिरी मिलेगी किसी से सूरत मिरी मिलेगी तुम्हारी फ़ुर्क़त में तंग आ कर ये मरने वालों का फ़ैसला है क़ज़ा से जो हम-कनार होगा उसे नई ज़िंदगी मिलेगी क़फ़स से जब छुट के जाएँगे हम तो सब मिलेंगे ब-जुज़-नशेमन चमन का एक एक गुल मिलेगा चमन की इक इक कली मिलेगी तुम्हारी फ़ुर्क़त में क्या मिलेगा तुम्हारे मिलने से किया मिलेगा 'क़मर' के होंगे हज़ार-हा ग़म रक़ीब को इक ख़ुशी मिलेगी — Qamar Jalalvi
मुझे बाग़बाँ से गिला ये है कि चमन से बे-ख़बरी रही कि है नख़्ल-ए-गुल का तो ज़िक्र क्या कोई शाख़ तक न हरी रही मिरा हाल देख के साक़िया कोई बादा-ख़्वार न पी सका तिरे जाम ख़ाली न हो सके मिरी चश्म-ए-तर न भरी रही मैं क़फ़स को तोड़ के क्या करूँँ मुझे रात दिन ये ख़याल है ये बहार भी यूँँ ही जाएगी जो यही शिकस्ता-परी रही मुझे अलम तेरे जमाल का न ख़बर है तेरे जलाल की ये कलीम जाने कि तूर पर तिरी कैसी जल्वागरी रही मैं अज़ल से आया तो क्या मिला जो मैं जाऊँगा तो मिलेगा क्या मिरी जब भी दर-ब-दरी रही मिरी अब भी दर-ब-दरी रही यही सोचता हूँ शब-ए-अलम कि न आए वो तो हुआ है क्या वहाँ जा सकी न मिरी फ़ुग़ाँ कि फ़ुग़ाँ की बे-असरी रही शब-ए-व'अदा वो जो न आ सके तो 'क़मर' कहूँगा ये चर्ख़ से तिरे तारे भी गए राएगाँ तिरी चाँदनी भी धरी रही — Qamar Jalalvi
सवाल छोड़ कि हालत ये क्यूँँ बनाई है उसे न सुन जो कहानी सुनी-सुनाई है पतंगा शम्अ' पे मरता है क्या बुराई है उसे किसी ने भी रोका है जिस की आई है हँसे हैं गुल न कली कोई मुस्कुराई है हुज़ूर कैसे ये कह दूँ बहार आई है ज़रूर कोई अलामत क़ज़ा की पाई है मुझे अज़ीज़ों ने सूरत तिरी दिखाई है न जाने हिज्र की रात और मिरी सियह-बख़्ती कहाँ कहाँ के अँधेरे समेट लाई है लहद से कब उठें देखो मुसाफ़िरान-ए-अदम सफ़र है दूर का रस्ते में नींद आई है असीर क्या कहें सय्याद ये तो समझा दे क़फ़स में बू-ए-चमन पूछने को आई है मुझे न छेड़ क़यामत है मेरी आहों में ख़ुदा रखे तिरी महफ़िल सजी-सजाई है — Qamar Jalalvi
देखते हैं रक़्स में दिन रात पैमाने को हम साक़िया रास आ गए हैं तेरे मय-ख़ाने को हम ले के अपने साथ इक ख़ामोश दीवाने को हम जा रहे हैं हज़रत-ए-नासेह को समझाने को हम याद रक्खेंगे तुम्हारी बज़्म में आने को हम बैठने के वास्ते अग़्यार उठ जाने को हम हुस्न मजबूर-ए-सितम है इश्क़ मजबूर-ए-वफ़ा शम्अ' को समझाएँ या समझाएँ परवाने को हम रख के तिनके डर रहे हैं क्या कहेगा बाग़बाँ देखते हैं आशियाँ की शाख़ झुक जाने को हम उलझनें तूल-ए-शब-ए-फ़ुर्क़त की आगे आ गईं जब कभी बैठे किसी की ज़ुल्फ़ सुलझाने को हम रास्ते में रात को मुढभेड़ साक़ी कुछ न पूछ मुड़ रहे थे शैख़-जी मस्जिद को बुत-ख़ाने को हम शैख़-जी होता है अपना काम अपने हाथ से अपनी मस्जिद को सँभालें आप बुत-ख़ाने को हम दो घड़ी के वास्ते तकलीफ़ ग़ैरों को न दे ख़ुद ही बैठे हैं तिरी महफ़िल से उठ जाने को हम आप क़ातिल से मसीहा बन गए अच्छा हुआ वर्ना अपनी ज़िंदगी समझे थे मर जाने को हम सुन के शिकवा हश्र में कहते हो शरमाते नहीं तुम सितम करते फिरो दुनिया पे शरमाने को हम ऐ 'क़मर' डर तू ये है अग़्यार देखेंगे उन्हें चाँदनी शब में बुला लाएँ बुला लाने को हम — Qamar Jalalvi
अब तो मुँह से बोल मुझ को देख दिन भर हो गया ऐ बुत-ए-ख़ामोश क्या सच-मुच का पत्थर हो गया अब तो चुप हो बाग़ में नालों से महशर हो गया ये भी ऐ बुलबुल कोई सय्याद का घर हो गया इल्तिमास-ए-क़त्ल पर कहते हो फ़ुर्सत ही नहीं अब तुम्हें इतना ग़ुरूर अल्लाहु-अकबर हो गया महफ़िल-ए-दुश्मन में जो गुज़री वो मेरे दिल से पूछ हर इशारा जुम्बिश-ए-अबरू का ख़ंजर हो गया आशियाने का बताएँ क्या पता ख़ाना-ब-दोश चार तिनके रख लिए जिस शाख़ पर घर हो गया हिर्स तो देखो फ़लक भी मुझ पे करता है सितम कोई पूछे तो भी क्या उन के बराबर हो गया सोख़्ता दिल में न मिलता तीर को ख़ूँ ऐ 'क़मर' ये भी कुछ मेहमाँ की क़िस्मत से मुयस्सर हो गया — Qamar Jalalvi