surkhiyaan kyun dhoondh kar laaun fasaane ke li.e | सुर्ख़ियाँ क्यूँँ ढूँढ कर लाऊँ फ़साने के लिए

  - Qamar Jalalvi

सुर्ख़ियाँ क्यूँँ ढूँढ कर लाऊँ फ़साने के लिए
बस तुम्हारा नाम काफ़ी है ज़माने के लिए

मौजें साहिल से हटाती हैं हबाबों का हुजूम
वो चले आए हैं साहिल पर नहाने के लिए

सोचता हूँ अब कहीं बिजली गिरी तो क्यूँँ गिरी
तिनके लाया था कहाँ से आशियाने के लिए

छोड़ कर बस्ती ये दीवाने कहाँ से आ गए
दश्त की बैठी-बिठाई ख़ाक उड़ाने के लिए

हँस के कहते हो ज़माना भर मुझी पर जान दे
रह गए हो क्या तुम्हीं सारे ज़माने के लिए

शाम को आओगे तुम अच्छा अभी होती है शाम
गेसुओं को खोल दो सूरज छुपाने के लिए

काएनात-ए-इश्क़ इक दिल के सिवा कुछ भी नहीं
वो ही आने के लिए है वो ही जाने के लिए

ऐ ज़माने भर को ख़ुशियाँ देने वाले ये बता
क्या 'क़मर' ही रह गया है ग़म उठाने के लिए

  - Qamar Jalalvi

Udas Shayari

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