पेश-ए-मंज़र में है कुछ और कुछ पस-ए-मंज़र में है
कुछ हक़ीक़त कुछ फ़साना राम और बाबर में है
ग़म के मारो मुख़्तसर है अर्सा-ए-तीरा-शबी
और इस के बा'द सब कुछ पंजा-ए-दावर में है
ख़्वाब सारे हो गए हैं नींद से अब मावरा
पेश कर ग़ाफ़िल अमल कोई अगर दफ़्तर में है
हाल माज़ी और मुस्तक़बिल सभी तो उस के हैं
हस्ती अपनी उस की ख़ातिर सीग़ा-ए-मसदर में है
क़ातिला ख़ंजर तिरा उस आब से महरूम है
इक चमक बिजली सी जो बिस्मिल के अब तेवर में है
चार-सू इक हूँ का आलम हर तरफ़ सन्नाटा है
अब 'क़मर' भी यूँँ ही सा बे-कार बैठा घर में है
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