ये काएनात है क्या दश्त क्या मकाँ क्या है
बस एक जज़्बा-ए-तख़्लीक़ है जहाँ क्या है
ख़ुदा ने देख के ताब-ए-तजस्सुस-ए-इंसाँ
नज़र पे हद सी लगा दी है आसमाँ क्या है
गला के छोड़ेगा हर शय को वक़्त का तेज़ाब
सिवाए नूर-ए-ख़ुदा और जावेदाँ क्या है
बस एक ग़ैब की तलवार ये ख़ुदाई है
फिर उस के सामने फ़रियाद क्या फ़ुग़ाँ क्या है
ग़म-ए-जहाँ का फ़साना बहुत तवील है दोस्त
हमारी एक शब-ए-ग़म की दास्ताँ क्या है
बचा ही क्या है तिरे पास बिक गया सब कुछ
बढ़ा ले 'राज़' कि ख़ाली है ये दुकाँ क्या है
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