बैठे बैठे कोई ख़याल आया
ज़िंदा रहने का फिर सवाल आया
कौन दरियाओं का हिसाब रखे
नेकियाँ नेकियों में डाल आया
ज़िंदगी किस तरह गुज़ारते हैं
ज़िंदगी भर न ये कमाल आया
झूट बोला है कोई आईना
वर्ना पत्थर में कैसे बाल आया
वो जो दो-गज़ ज़मीं थी मेरे नाम
आसमाँ की तरफ़ उछाल आया
क्यूँँ ये सैलाब सा है आँखों में
मुस्कुराए थे हम-ख़याल आया
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Rahat Indori
our suggestion based on Rahat Indori
As you were reading Dhokha Shayari Shayari