apne rukh par naqaab rahne de | अपने रुख़ पर नक़ाब रहने दे

  - RIZWAN ALI RIZWAN

अपने रुख़ पर नक़ाब रहने दे
दिल में ये इज़्तिराब रहने दे

मेरी आँखों की पुतलियों से परे
इस हक़ीक़त को ख़्वाब रहने दे

साक़िया चश्म-ए-नीलगूँ से पिला
जाम-ओ-मीना शराब रहने दे

कोई काँटा ही बख़्श दे मुझ को
चम्पा बेला गुलाब रहने दे

एक है लफ़्ज़-ए-'तू' मोहब्बत का
आप तुम और जनाब रहने दे

ज़ख़्म से ख़ूँ न पोंछ ऐ ज़ालिम
ज़ख़्म की आब-ओ-ताब रहने दे

कुछ तअल्लुक़ हो हश्र पर बाक़ी
दरमियाँ कुछ हिसाब रहने दे

  - RIZWAN ALI RIZWAN

Nasha Shayari

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