जान पर वो खेल कर आज़ाद हम को कर गए
चैन से हम जी सकें बस इस लिए वे मर गए
आख़िरी क़तरा लहू का जिस्म में था जबतलक
धड़ शहीदों के लड़े थे जब कि कट ये सर गए
ये तिरंगा शान से जो मुल्क का लहरा रहा
है टिका उन लालों पर जो देश के दिलबर गए
मैं गवाही दे रहा हूँ उन सभी की ओर से
जो कई भाई कई बेटे कई शौहर गए
आज जब ‘रोहित’ सभी तारीख़ के पन्ने पढ़े
याद कर के उन शहीदों को नयन भी भर गए
— Rohit Asthana Prabhav















