मत दिला याद बिखर जाऊँगा
दिल पुकारा मैं सुधर जाऊँगा
रूठकर घर से निकल आया हूँ
रात होगी तो किधर जाऊँगा
वक़्त के साथ बिगड़ता ही गया
उस को लगता था सुधर जाऊँगा
घर में शीशा ही नहीं है मेरे
उस की आँखों में सँवर जाऊँगा
जो भी मिलता हैं यही पूछता है
गांव से कब मैं शहर जाऊँगा
— RUSHIKESH PAWAR















