गली से उस की जब गुज़रूँ शिकायत आ ही जाती है
वही सिहरन वही तड़पन हरारत आ ही जाती है
वहाँ छोटी सी खिड़की है गली के ठीक कोने पर
निगाहें जब भी उठती हैं मोहब्बत आ ही जाती है
लगा कजरा सजा गजरा बदन जैसे कोई सरगम
उतरती है जो ज़ीने से क़यामत आ ही जाती है
उड़ें गेसू हवा महके लगे तस्वीर जन्नत की
दुपट्टा सरके आहिस्ता तो शामत आ ही जाती है
न ज़ेवर है न झुमका है मगर वो हुस्न ऐसा है
कि बस दीदार हो जाए तबीयत आ ही जाती है
दबा कर होंठ को जब वो ज़रा सा मुस्कुराती है
तो फिर मुर्दा से इस दिल में भी हरकत आ ही जाती है
— Saarthi Baidyanath















