तीरगी में जली मशाल हैं हम
ज़ालिमों के लिए ज़वाल हैं हम
कारसाज़ी में बेमिसाल हैं हम
ग़म छुपाने में बाकमाल हैं हम
जो क़रीब आया ख़ूब पछताया
कोई उलझा हुआ सा जाल हैं हम
बाज़ियाँ जीत लीं हैं सब लेकिन
फिर भी बेहद शिकस्ता हाल हैं हम
हम को रंजिश नहीं मुहब्बत से
बे-वफ़ाई से कुछ निढाल हैं हम
ओढ़ कर घूमते हैं ख़ामोशी
और अंदर से इक वबाल हैं हम
ग़ैर क्या ही हमें दग़ा देंगे
अब तो अपनों से भी निहाल हैं हम
हल नहीं कर सका कोई अब तक
ऐसा मुश्किल सा इक सवाल हैं हम
क़ुर्ब जबसे मिला है रब का सना
तब से हर तौर ही बहाल हैं हम
— Sana Hashmi















