मेरे तन पे शोहरत का कम्बल दिखता
जब मेरे सर पर माँ का आँचल दिखता
कितना सोणा रूप सलोना लगता है
जब छोटे बच्चों के सर काजल दिखता
दूर से काली रातों में देखूँ तुमको
रेल की पटरी पर जैसे सिग्नल दिखता
हम दोनों के बीच में इतनी दूरी है
जितनी दूर यहाँ से वो बादल दिखता
जिसके सर से माँ का साया उठ जाये
उसको आगे का रस्ता ओझल दिखता
तुम बोलो मैं तुमको कैसा दिखता हूँ
दुनिया वालों को तो मैं पागल दिखता
बड़े-बुज़ुर्गों का सागर सम्मान करो
बड़े दरख़्तों से सुन्दर जंगल दिखता
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