mere tan pe shohrat ka kambal dikhta | मेरे तन पे शोहरत का कम्बल दिखता

  - Santosh sagar

मेरे तन पे शोहरत का कम्बल दिखता
जब मेरे सर पर माँ का आँचल दिखता

कितना सोणा रूप सलोना लगता है
जब छोटे बच्चों के सर काजल दिखता

दूर से काली रातों में देखूँ तुमको
रेल की पटरी पर जैसे सिग्नल दिखता

हम दोनों के बीच में इतनी दूरी है
जितनी दूर यहाँ से वो बादल दिखता

जिसके सर से माँ का साया उठ जाये
उसको आगे का रस्ता ओझल दिखता

तुम बोलो मैं तुमको कैसा दिखता हूँ
दुनिया वालों को तो मैं पागल दिखता

बड़े-बुज़ुर्गों का सागर सम्मान करो
बड़े दरख़्तों से सुन्दर जंगल दिखता

  - Santosh sagar

Samundar Shayari

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