मेरे तन पे शोहरत का कंबल दिखता
जब मेरे सर पर माँ का आँचल दिखता
कितना सोणा रूप सलोना लगता है
जब छोटे बच्चों के सर काजल दिखता
दूर से काली रातों में देखूँ तुम को
रेल की पटरी पर जैसे सिग्नल दिखता
हम दोनों के बीच में इतनी दूरी है
जितनी दूर यहाँ से वो बादल दिखता
जिस के सर से माँ का साया उठ जाए
उस को आगे का रस्ता ओझल दिखता
तुम बोलो मैं तुम को कैसा दिखता हूँ
दुनिया वालों को तो मैं पागल दिखता
बड़े-बुज़ुर्गों का सागर सम्मान करो
बड़े दरख़्तों से सुंदर जंगल दिखता
— Santosh sagar















