नाम ले कर मेरे साक़ी से पुकारा न गया

और मुझ से भी मेरा हाथ बढ़ाया न गया

ग़ैर मुमकिन है लिखारी को ख़सारा न गया
इस कहानी में कोई एक भी मारा न गया

हम से क्या इश्क़ हुआ ये भी कोई इश्क़ हुआ
ख़ाक छानी न गई हाल बिगाड़ा न गया

रंज उस को भी न हो इस लिए वक़्त-ए-रुख़सत
हम से चेहरे पे कोई दर्द सजाया न गया

दुश्मनी मोल हर इक रंग से ले ली उस ने
जिस मुसव्विर से तेरा अक्स उभारा न गया

रौशनी भी गई और रौशनी की ख़्वाहिश भी
आँख से पर तेरे जलवों का नज़ारा न गया

ये तेरे हुस्न की तौहीन सरासर होगी
तेरे तलवों पे अगर चाँद को वारा न गया

— Shadab Javed

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