तुझे बस देख कर हर ग़म छुपाना हो ही जाता है
तिरी ख़ातिर मिरा भी मुस्कुराना हो ही जाता है
वो काली बाँधना साड़ी कि ज़ुल्फ़ें खोलना उस का
मिरी हर शाम का फिर वो ठिकाना हो ही जाता है
कि इतना प्यारा होता है कभी तो ग़ुस्सा भी उस का
उसे हर रोज़ फिर यूँ ही सताना हो ही जाता है
वो बस छू कर ही मारा करती थी ज़ख़्मों के दर्दों को
उसे हर ज़ख़्म अब अपना दिखाना हो ही जाता है
गुज़रती ज़िंदगी जो साथ उस के तो थी कोई बात
उसे अब सोच कर ख़ुद को रूलाना हो ही जाता है
यही सोचा था उस ने छोड़ने से पहले हम को दोस्त
कि हर कपड़ा किसी इक दिन पुराना हो ही जाता है
— Shantanu Bhardwaj















