बदलूँगा ज़माना पर मैं वक़्त ज़रा लूँगा
दुश्मन को भी फिर इक दिन मैं दोस्त बना लूँगा
अच्छी ही नहीं लगती चेहरे की उदासी सो
बन कर मैं तमाशा ख़ुद लोगों को हँसा लूँगा
प्यारी सी कहानी है हर एक मुसाफ़िर की
हर एक मुसाफ़िर को मैं पास बिठा लूँगा
छूना था जिसे मुझ को मैं छू ही नहीं पाया
उस के छुए लोगों को अब दोस्त बना लूँगा
है कोई नहीं मेरा जो पोंछे मिरे आँसू
रो रो के यहाँ ख़ुद को ख़ुद चुप भी करा लूँगा
पंखे से मिला दूँगा रस्सी को किसी दिन मैं
दफ़्तर का बहाना भी कब तक मैं बना लूँगा
— Shantanu Bhardwaj















