पैसा अच्छा कमा रहे हैं हम
ख़ुशियाँ अपनी लुटा रहे हैं हम
रोज़ इक दिन गँवा रहे हैं हम
फ़र्ज़ अपने निभा रहे हैं हम
हम को मंज़िल मिली नहीं अपनी
रस्ता सब को दिखा रहे हैं हम
जिस को भी अपना कहते हैं हम सब
दिल उसी का दुखा रहे हैं हम
हम जहाँ बिछड़े थे कभी ख़ुद से
क्यूँ वही फिर से जा रहे हैं हम
कौन रोकेगा ख़ुद-कुशी को अब
मरना है कह के जा रहे हैं हम
— Shantanu Bhardwaj















