काश
काश ! हम तुम ज़िन्दगी में मिलते ही ना
साथ जितना भी चले हम, चलते ही ना
फ़ासलों का डर न होता फिर कभी भी
इश्क़ के साँचे में हम गर ढलते ही ना
काश ! हम तुम ज़िन्दगी में मिलते ही ना
मैं ने लफ़्ज़ों से कहा ना होता कुछ भी
तुम ने भी उस वक़्त सुना ना होता कुछ भी
दूर तब के, जा चुके होते, अगर हम
सच में शायद अब बचा ना होता कुछ भी
इश्क़ के ख़्वाबों में हम तुम पलते ही ना
इस तरह याँ फ़ासलों में ढलते ही ना
काश ! हम तुम ज़िन्दगी में मिलते ही ना
— karan singh rajput















