दिन गुज़रता नहीं आपसे क्या कहें

रात कटती है अब जाग के क्या कहें

जिस्म में रह गई बेबसी इस लिए
हम ने देखे बड़े हादसे क्या कहें

जा रहे थे हमें छोड़ कर और हम
चीख़ते ही रहे चीख़ते क्या कहें

अब किसी तौर भी दिन गुज़रता नहीं
ज़िंदगी कब तलक देखते क्या कहें

बद-दुआ माँगते थे मिरे हक़ में वो
हम रहे बस दुआ माँगते क्या कहें

कर लिया ख़ाक ख़ुद को हमीं ने बता
और कितना उसे चाहते क्या कहें

ज़िंदगी ढूॅंढते ही रहे हम तुम्हें
ख़त्म जो हो गए रास्ते क्या कहें

— Shivam Raahi Badayuni

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