गर रास्ते की कोई भी मंज़िल न हो
तो ख़्वाहिश-ए-दिल फिर कभी घाइल न हो
माना कि बे हद बे-कराँ है बहर-ए-ग़म
तो क्या हुआ जो इक लब-ए-साहिल न हो
गर वस्ल है तो हिज्र भी है 'इश्क़ में
वो 'इश्क़ ही क्या जिस
में दिल बिस्मिल न हो
हर इक क़दम पे या-ख़ुदा काँटे मिले
ऐसा न करना गुल कोई हासिल न हो
मौला मुझे मंज़ूर है हर इम्तिहान
वो रास्ते ही क्या जहाँ मुश्किल न हो
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