रात के साढ़े तीन बजे हैं

सामने वाली शेल्फ में सब से आगे रक्खी बुक को पिछले 30 मिनट से देख रहा हूँ
बुक पर जर्मन नाम लिखा है

कौन है साला, क्या करता है, कौन सी शय है, क्या होता है, सोच रहा हूँ
सोच रहा हूँ पढ़कर देखूँ, पढ़ लेता हूँ।

अच्छा तो ये Scientist है! अच्छा तो ये सूफी भी है!
Heisenberg का नाम सुना है? इस की थ्योरी पढ़ी है तुम ने?

ये कहता है एक लम्हे में एक ज़र्रे कि या तो तुम रफ्तार पता कर सकते हो या
कर सकते हो पता के ज़र्रा किस जगह पर रुका हुआ है?
लेकिन दोनों साथ नहीं कर सकते हो तुम एक लम्हे में

या'नी मुझ से दूर निकलने के रस्ते पर
किस तेजी से भाग रही हो
किस जगह पर ठहरी हो तुम
पता लगाना नामुमकिन है

या'नी मेरे जिस्म का ज़र्रा ज़र्रा मुझ से भाग रहा है
किस तेजी से कहाँ रुका है?
पता लगाना नामुमकिन है

या'नी मैं हूँ, कहाँ हूँ, लेकिन किसे पता है?
पता लगाना नामुमकिन है

या'नी Heisenberg और मेरा दुख मिलता है
मुझे पता है, पता लगाना नामुमकिन है

ख़ैर छोड़ो मैं पंखे से लटक रहा हूँ
हाथ में Heisenberg की बुक है
दोनों भाई साथ मरेंगे

— Siddharth Nigam

Dard Shayari

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