देखते देखते ज़ख़्म भर ही गया
चारागर आख़िरश अच्छा कर ही गया
एक हिचकी के फिर बाद में दूसरी
मैं तो सचमुच बहुत आज डर ही गया
कोई आया नहीं रोकने टोकने
मैं बिगड़ते बिगड़ते सुधर ही गया
कोई रुकना नहीं चाहता था जहाँ
उस जगह एक दिन मैं ठहर ही गया
फिर बुला कर मुझे आज़मा कर मुझे
एक इंसान एहसान कर ही गया
ज़ख़्म बाहर के भरता रहा उम्र-भर
ज़ब्त टूटा तो मैं भी बिखर ही गया
ना-ख़ुदा ने पुकारा मुझे इस तरह
डरते डरते नदी में उतर ही गया
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Sohil Barelvi
our suggestion based on Sohil Barelvi
As you were reading Teer Shayari Shayari