अपनी मंजिल के लिए रोज ये नुक़सान किया
मैंने ख़्वाबों के एवज़ नींद को कुर्बान किया
तुम ही बतलाओ उसे कैसे भुलाऊं जिसने
मुझको हर एक मुलाक़ात पे हैरान किया
एक ही धुन में रहा इस लिए भटका ही नहीं
बेखु़दी ने मेरी राहों को भी आसान किया
मैं तो समझा था तुझे अपना ख़ज़ाना लेकिन
'इश्क़ तूने ही मुझे बे सर-ओ-सामान किया
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