apni manzil ke li.e roz ye nuksaan kiya | अपनी मंजिल के लिए रोज ये नुक़सान किया

  - Tariq Faiz

अपनी मंजिल के लिए रोज ये नुक़सान किया
मैंने ख़्वाबों के एवज़ नींद को कुर्बान किया

तुम ही बतलाओ उसे कैसे भुलाऊं जिसने
मुझको हर एक मुलाक़ात पे हैरान किया

एक ही धुन में रहा इस लिए भटका ही नहीं
बेखु़दी ने मेरी राहों को भी आसान किया

मैं तो समझा था तुझे अपना ख़ज़ाना लेकिन 'इश्क़ तूने ही मुझे बे सर-ओ-सामान किया

  - Tariq Faiz

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