जचते हों न जचते हों अदाकार पे आँसू
दरकार मगर हैं मेरे किरदार पे आँसू
है ग़म भी मेरे यार का गुलशन ही के जैसा
है फूल पे शबनम सा वो रुख़्सार पे आँसू
तादाद में ग़म आऍं तो कुछ बात बनेगी
निकलेंगे वगरना कहाँ दो-चार पे आँसू
अब के किसी उस्ताद के हाथ आया है जो साज़
बरसाएगा आकाश भी मल्हार पे आँसू
तस्वीर से सीलन की जगह ढक जो रखी है
दिखते नहीं मेहमान को दीवार पे आँसू
या रब यहाँ क़ीमत किसी की है कहाँ इतनी
क्यूँ कोई लुटाए तेरे संसार पे आँसू
— Ananth Faani















