उतारे उस के चेहरे से जो सारे ही नक़ाबों को
रखा करता हूँ दूर ऐसे सवालों और जवाबों को
गुलाबों से लबों को तोलना हरगिज़ नहीं जाइज़
मुआ'फ़ी मीर जी तौलेंगे हम लब से गुलाबों को
सुना है ये सिमटना फैलना सारा तसलसुल है
समझना क्या अलग फिर जुगनुओं से आफ़ताबों को
ज़हानत वस्ल उदासी ज़िंदगी ईमाँ सुख़न-कारी
शराबी लोग क्या क्या नाम देते हैं शराबों को
ग़ज़ल की शाह-रह पे चल पड़ी हैं गाड़ियाँ कितनी
मिलेगा ख़ूब धंधा सब किनारे वाले ढाबों को
बदन के खेल में तो तय थी अपनी हार 'फ़ानी जी'
बनाया इस लिए मैदान हम ने फिर किताबों को
— Ananth Faani















