लोग तन्हा चले क़ाफ़िला हो गए
फिर ज़माने का वे हौसला हो गए
पाँव का अपने हम आबला हो गए
और ख़ुद के लिए मसअला हो गए
वो कभी हम को मंज़िल बुलाता था पर
अब उसी के लिए रास्ता हो गए
एक दूजे से लड़ते हुए रात दिन
ज़ेहन-ओ-दिल ये मिरे कर्बला हो गए
अब उदासी बिना जी नहीं लगता है
ग़म मिरे दिल के ये ज़ाइक़ा हो गए
आइना होना था सच दिखाना था सब
लोग वो झूठ का सिलसिला हो गए
जो भी करते थे सलमा वफ़ा से जफ़ा
आज वो लोग अहल-ए-वफ़ा हो गए
— Salma Malik















