जो ग़ज़ल का मिरी क़ाफ़िया हो
तुम मुझे बस वही ज़ाविया दो
इन उसूलों पे जो आँच लाए
तुम कभी भी न वो रास्ता लो
हाशिए पर लिखी मैं इबारत
इस इबारत को तुम मक़बरा दो
लफ़्ज़ मेरे बनें ये हक़ीक़त
तुम मुझे बस यही इक दुआ दो
लौट कर वो नहीं आए वापिस
कूच दिल की गली कर गया जो
फिर नहीं तोड़ पाए उसे कुछ
टूट कर जो बड़ा ही जुड़ा हो
क्यूँ न 'सलमा' कहेगी ग़ज़ल ये
गर बने जो मिरा क़ाफ़िया वो
— Salma Malik















