तुझ को तकता रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ
वो मिट्टी हो जाता है
जिस को हाथ लगाता हूँ
मैं मिट्टी के ख़्वाबों से इश्क़ बना के बैठा हूँ
आप को छाँव मुबारक हो
मैं तो पेड़ उगाता हूँ
मैं काँच का छोटा सा घर
किस के लिए बनाता हूँ
कोई मुझ से बात करे
हर इक का मुँह तकता हूँ
तुम ही तुम तो होते हो
जब मैं ख़ुद में होता हूँ
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