ज़रा सी छाँव कमाने में उम्र बीत गई
दरख़्त ख़ुद को बनाने में उम्र बीत गई
फुज़ूल कह दिया उस ने हमारी वहशत को
वो फ़न कि जिस को कमाने में उम्र बीत गई
वो एक रब्त जो तुझ से हमारा था ही नहीं
वो एक रब्त बचाने में उम्र बीत गई
ज़रूरी काम कोई वक़्त पे किया ही नहीं
बस अपनी मौज उड़ाने में उम्र बीत गई
जुनूँ-जुनूँ में चले आए दश्त में ये लोग
पर इन की लौट के जाने में उम्र बीत गई
बस एक बार लिखा दिल पे यूँ ही उस का नाम
फिर उस को दिल से मिटाने में उम्र बीत गई
नदी से इश्क़ था मल्लाह को प कह न सका
और उस की नाव चलाने में उम्र बीत गई
अब ऐसे शख़्स को पाना तो ख़्वाब ही
समझो कि जिस को हाथ लगाने में उम्र बीत गई















