''मशवरा''
तुम हम से मोहब्बत क्यूँ कर बैठी हो
तुम्हें इल्म है हम किसी और से मोहब्बत करते हैं
मगर तुम्हारे दिल में क्या आया कि तुम हम से मोहब्बत कर के बैठी हो
देखो अब ये हमारा दिल किसी का नहीं हो सकता
देखो तुम मासूम हो अभी कमसिन उम्र हो
अभी तुम मोहब्बत के जाल में पड़ी नहीं हो
अभी तुम्हारे ख़ुश रहने के दिन हैं
मोहब्बत कर के तुम बर्बाद हो जाओगी
याद बहुत करोगी लेकिन रोटी कम खाओगी
फूल जैसे चेहरे को क्यूँ मुरझाना चाहती हो
सच बताओ क्यूँ हमारे क़रीब आना चाहती हो
हम किसी की फ़ुर्क़त में रोज़-ओ-शब रोते हैं
धीरे धीरे उस की सारी यादों को धोते हैं
तुम्हारे गेसू काली घटाएँ
तुम्हारे लब और तुम्हारी अदाएँ
अपने दिल को कैसे भी समझाओ
जान-ए-मन तुम हम को भूल जाओ















