श्राद्ध की जिसकी मुझे तू ये मिठाई दे रहा है
वो मरा जो आदमी मुझ को सुनाई दे रहा है
बाप जिसका ख़र्च करता था नशे में सारे पैसे
ला के अपनी माँ को वो सारी कमाई दे रहा है
माफ़ सारी ग़लतियाँ होती हैं उसकी इस लिए बस
कितने प्यारे ढंग से अपनी सफ़ाई दे रहा है
जितना मेरे जाने का ग़म है तुझे तू बोलता है
उससे ज़्यादा ही ख़ुशी से तू विदाई दे रहा है
तू मुझे बुद्धू समझता है मुझे मालूम नइँ क्या
बोलता हूँ कुछ नहीं पर सब दिखाई दे रहा है
जब सही लगता उसे ये क्यों लगे मुझ को ग़लत फिर
वो वफ़ाई के न बदले बेवफ़ाई दे रहा है
बेवफ़ा से तो कोई उम्मीद करना भी ग़लत है
मान तू कैसे गया पर वो दवाई दे रहा है
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