हमारा दिल बहुत चोटिल है यारों

तभी तो ज़िंदगी बोझिल है यारों

सफ़र से लौट कर आया नहीं वो
जो कहता था सफ़र कामिल है यारों

नज़ारे याद आते हैं सफ़र के
यहाँ जब सामने मंज़िल है यारों

मेरे अश'आर पढ़ते फिर रहे हैं
मुझे कहते थे जो जाहिल है यारों

वहीं पर चूम आया हूँ उसे मैं
जहाँ गर्दन पे उस के तिल है यारों

शरीक-ए-जुर्म अपना बस वही है
हमारे पास जो इक दिल है यारों

तुम्हें लगता नहीं है देख कर क्या
'सहज' होना बहुत मुश्किल है यारों

— Vikas Sahaj

More by Vikas Sahaj

Other ghazal from the same pen

See all from Vikas Sahaj →

Manzil Shayari

Shers of manzil.

All Manzil Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling