ख़त्म करेंगे जब ये करतब रो लेंगे

आ जाएगा इस का भी ढब रो लेंगे

तुम हँसते ही जँचते हो जो कहती थी
उस लड़की की ख़ातिर भी अब रो लेंगे

तुम से बिछड़े हैं तो इस पर क्या रोना
तुम को रोता देखेंगे जब रो लेंगे

अपने हिस्से की ख़ुशियाँ जग को देकर
हम रोने के आदी हैं रब रो लेंगे

एक गली में हर दिन अपनी ड्यूटी है
रोने को इतवार मिले जब रो लेंगे

— Vikas Sahaj

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