एक ख़ामोशी ने सदा पाई ढाई हर्फ़ों में फिर वो हकलाईचार दीवार चंद छिपकलियाँहिज्र की रात के तमाशाईडूबने का उसे मलाल नहींजिस ने देखी नदी की रा'नाईआख़िरी ट्रेन थी तिरी जानिबजो ग़लत प्लेटफार्म पर आईबारिशों ने हमें उदास कियासील दीवार में उतर आई— Vikram Sharma