ग़मों की सूई में यादें पिरो करउदासी ने बुना है मेरा स्वेटरकिसी तन्हाई का बेताल मुझ सेहै लिपटा नाम के धोके में आ करतेरे जज़्बों को लफ़्ज़ों का फ़लक देक़फ़स से इन परिंदों को रिहा करज़ियादा वज़्न है टूटे न कश्तीबचा ले ख़ुद को तू मुझ को गिरा कर— Vikram Sharma