तुम को किसी से मिलने की चाहत नहीं हुई
या'नी किसी से तुम को मुहब्बत नहीं हुई
मालूम होगा तुम को कहाँ दर्द हिज्र का
ये जो तुम्हारी आशिक़ी रुख़सत नहीं हुई
लगता नहीं कि इश्क़ में धोखा मिला कभी
तुम को अभी ग़ज़ल की जो आदत नहीं हुई
ये शा'इरी गज़ल सभी मरहम हैं हिज्र के
सो वस्ल वालों को ये ज़रूरत नहीं हुई
तावील था तजुर्बा हमारा ये दुनिया का
सो इश्क़ करने की हमें जुरअत नहीं हुई
— Vivek Chaturvedi















