men vo kashtii hooñ k | में वो कश्ती हूँ कभी जिस को किनारा न मिला

  - Waqif rae Barelvi
मेंवोकश्तीहूँकभीजिसकोकिनारामिला
लेलियाअपनीजवानीकासहारामैंने
जबमुझेक़ौमकेहाथोंकासहारामिला
होकेमजबूरजहन्नमकोबसायामैंने
जबमुझेमंदिर-ओ-मस्जिदमेंठिकानामिला
कलहिक़ारतसेजोकहतेथेभिकारनमुझको
आजकहतेहैंकिगुलशनमेंनयाफूलखिला
कोईसमझामेरीरूहकोख़ामोशपुकार
सबसमझतेरहेचलताहोसिक्कामुझको
चंदलम्हेतोगुज़रजाएँगेअच्छे-ख़ासे
जिसनेदेखाउसीअंदाज़सेदेखामुझको
खेलतीहैमिरीरगरगसेयेपापीदुनिया
देकेकाग़ज़केखिलौनेमुझेबहलातीहै
मेरीमजरूहजवानीकीशिकस्ताकश्ती
कितनेबिफरेहुएतूफ़ानोंसेटकरातीहै
मेरीआग़ोशकोफ़िरदौससमझनेवालो
तुमकोमा'लूमहैकिसतरहसेमैंजितनीहूँ
चंदचाँदीकेखनकतेहुएसकूँकेतले
रातफिरअपनीजवानीकालहूपीतीहूँ
गंदीनालीमेंउसेफेंकदियाजाएगा
वोकलीजोअभीमा'सूमहैबे-परवाहै
मेरीबच्चीमेरीबच्चीभीतवाइफ़होगी
साँपकीतरहयेएहसासमुझेदस्ताहै
कलकिसीक़ौमकेख़ादिमनेसहारादिया
आजकिसमुँहसेयेकहतेहोकिबद-कारहूँमैं
मैंतुम्हारेहीतोकिरदारकाआईनाहूँ
कौनकहताहैकिपापीहूँगुनाहगारहूँमैं
  - Waqif rae Barelvi
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Shaheed Shayari

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