जानती बूँद बूँद डर मेरा
बारिशों में जला था घर मेरा
वस्ल के इंतिज़ार में जानाँ
हिज्र का ख़त्म होगा डर मेरा
है जिसे मेरे होने से इनकार
उस के बच्चों में है असर मेरा
इश्क़ के दर पटक पटक कर भी
फूटता क्यूँ नहीं है सर मेरा
तू नए आशिक़ों से कहना दोस्त
देख लें एक बार घर मेरा
ये समझ आई दुनिया मुझ को जब
काम आया नहीं हुनर मेरा
दोस्ती तू करे मोहब्बत मैं
ऐसे होगा नहीं बसर मेरा
कौन सा फूल तू ने तोड़ा है
क्यूँ महकता नहीं है घर मेरा
सींचता हूँ मैं आँसुओं से भी
फिर भी सूखा है क्यूँ शजर मेरा
जब उठी थी उधर तेरी डोली
तब जनाज़ा उठा इधर मेरा
— Anuj Vats















