चूहों ने इक शहर बसाया
बेहद आली-शान
बेहद आली-शान
अपने शहर का नाम उन्हों ने
रक्खा चूहिस्तान
चूहिस्तान का नाम सुना तो
ख़ालिद और इरफ़ान
इक दिन इक बिल्ली को ले कर
पहुँचे चूहिस्तान
देख के बिल्ली को चूहों के
ख़ता हुए औसान
भाग गए जब सारे चूहे
छोड़ के चूहिस्तान
ले कर ख़ुश ख़ुश घर को लौटे
ख़ालिद और इरफ़ान
चूहिस्तान के गोदामों में
था जो भी सामान
Read Fullरक्खा चूहिस्तान
चूहिस्तान का नाम सुना तो
ख़ालिद और इरफ़ान
इक दिन इक बिल्ली को ले कर
पहुँचे चूहिस्तान
देख के बिल्ली को चूहों के
ख़ता हुए औसान
भाग गए जब सारे चूहे
छोड़ के चूहिस्तान
ले कर ख़ुश ख़ुश घर को लौटे
ख़ालिद और इरफ़ान
चूहिस्तान के गोदामों में
था जो भी सामान
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एक हैं नानी जान हमारी
क्या बतलाएँ कितनी प्यारी
क्या बतलाएँ कितनी प्यारी
उन के मुँह में दाँत नहीं हैं
इतनी बूढ़ी हैं बेचारी
फिर भी वो खाया करती हैं
कूट कूट कर पान सुपारी
हुई है जब से लाहक़ उन को
ब्लड-प्रेशर की बीमारी
शोर ज़रा भी हो तो उन पर
होती है घबराहट तारी
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चंदा-मामा तुम को मामा
नहीं कहूँगा नहीं कहूँगा
नहीं कहूँगा नहीं कहूँगा
माँगे का उजयाला तुम में
बिन माँगे सब काला तुम में
बंजर धरती बंजर खेती
मौसम कब हरियाला तुम में
मैं अच्छी धरती का मालिक चंदा-मामा
तुम को मामा नहीं कहूँगा नहीं कहूँगा
बादल से घबराते हो तुम
डर डर कर छुप जाते हो तुम
तुम से क्या उम्मीदें रखना
कब जाओ कब आते हो तुम
मैं हूँ एक बहादुर बच्चा चंदा-मामा
तुम को मामा नहीं कहूँगा नहीं कहूँगा
चर्ख़े वाली बुढ़िया नानी
चर्ख़े ले कर कहाँ गई है
आज तुम्हारी शान पुरानी
सब झूटी थी नहीं रही है
क्यूँ तुम झूटी शान दिखाते चंदा-मामा
तुम को मामा नहीं कहूँगा नहीं कहूँगा
Read Fullबिन माँगे सब काला तुम में
बंजर धरती बंजर खेती
मौसम कब हरियाला तुम में
मैं अच्छी धरती का मालिक चंदा-मामा
तुम को मामा नहीं कहूँगा नहीं कहूँगा
बादल से घबराते हो तुम
डर डर कर छुप जाते हो तुम
तुम से क्या उम्मीदें रखना
कब जाओ कब आते हो तुम
मैं हूँ एक बहादुर बच्चा चंदा-मामा
तुम को मामा नहीं कहूँगा नहीं कहूँगा
चर्ख़े वाली बुढ़िया नानी
चर्ख़े ले कर कहाँ गई है
आज तुम्हारी शान पुरानी
सब झूटी थी नहीं रही है
क्यूँ तुम झूटी शान दिखाते चंदा-मामा
तुम को मामा नहीं कहूँगा नहीं कहूँगा
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हदीस-ए-ज़ुल्म-ओ-सितम है हनूज़ ना-गुफ़्ता
हनूज़ मोहर ज़बानों पे ख़ामुशी की है
उस एक जाम ने साक़ी की जो अता ठहरा
सुकूँ दिया है न कुछ दर्द में कमी की है
हमें ये नाज़ न क्यूँ हो कि नय-नवाज़ हैं हम
हमारे होंटों ने ईजाद नग़्मगी की है
चमन में सिर्फ़ हमीं राज़दाँ हैं काँटों के
गुलों के साथ बसर हम ने ज़िंदगी की है
फ़िराक़-ए-यार ने बख़्शी है वस्ल की लज़्ज़त
ख़याल-ए-यार ने ज़ुल्मत में रौशनी की है
हैं जिस की दीद से महरूम आज तक 'ख़ावर'
उसी की हम ने तसव्वुर में बंदगी की है
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भागते सूरज को पीछे छोड़ कर जाएँगे हम
शाम के होते ही वापस अपने घर जाएँगे हम
शाम के होते ही वापस अपने घर जाएँगे हम
काटने को एक शब ठहरे हैं तेरे शहर में
क्या बताएँ सुब्ह होगी तो किधर जाएँगे हम
धूप में फूलों सा मुरझा भी गए तो क्या हुआ
शहर से होंटों के पैमाने तो भर जाएँगे हम
आज गर्दूं की बुलंदी नापने में महव हैं
कल किसी गहरे समुंदर में उतर जाएँगे हम
ढूँडते खोया हुआ चेहरा किसी शीशे में क्यूँ
जानते गर ये कि साए से भी डर जाएँगे हम
कुछ हमारा हाल भी 'ख़ावर' है कुंदन की तरह
दुख के शो'लों में जलेंगे तो निखर जाएँगे हम
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कब बयाबाँ राह में आया ये समझा ही नहीं
चलते रहने के सिवा ध्यान और कुछ था ही नहीं
चलते रहने के सिवा ध्यान और कुछ था ही नहीं
कर्ब-ए-मंज़िल का हो क्या एहसास इन अश्जार को
जिन के साए में मुसाफ़िर कोई ठहरा ही नहीं
किस को बतलाते कि आए हैं कहाँ से कौन हैं
हम फ़क़ीरों का किसी ने हाल पूछा ही नहीं
क्या तलब करता किसी से ज़िंदगी का ख़ूँ-बहा
मुजरिमों में मेरा क़ातिल कोई निकला ही नहीं
बे-तहाशा प्यार की दौलत लुटाई उम्र भर
दोस्ती का हम ने कुछ अंजाम सोचा ही नहीं
घूमता पाया गया था शहर में वो एक दिन
फिर किसी ने तेरे दीवाने को देखा ही नहीं
दोस्तो 'ख़ावर' सुनाए क्या तुम्हें ताज़ा ग़ज़ल
मुद्दतों से उस ने कोई शे'र लिक्खा ही नहीं
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मुझ को नहीं मालूम कि वो कौन है क्या है
जो साए के मानिंद मिरे साथ लगा है
जो साए के मानिंद मिरे साथ लगा है
इक और भी है जिस्म मिरे जिस्म के अंदर
इक और भी चेहरा मिरे चेहरे में छुपा है
महताब तो आएगा न सीढ़ी से उतर कर
दीवाना किस उम्मीद पे रस्ते में खड़ा है
मिलने की तमन्ना है मगर उस से मिलें क्या
जिस शख़्स का इस शहर में घर है न पता है
लिखता हूँ नई नज़्म-ओ-ग़ज़ल जिस के सबब मैं
वो ज़ौक़-ए-सुख़न तो मुझे विर्से में मिला है
मैदाँ में चले आओ तो खुल जाए ये तुम पर
क्या शाम की सरशार हवाओं में मज़ा है
सोचा था मिरे साथ चलेगा जो सफ़र में
घर पर वो मिरा ख़्वाब-ए-हसीं छूट गया है
हम 'मीर' का दीवान थे क्या फ़हम पे खुलते
अख़बार समझ कर हमें लोगों ने पढ़ा है
कहते हैं कि उस शहर में है धूम हमारी
देखा है किसी ने न जहाँ हम को सुना है
बाहरस कोई आज तो 'ख़ावर' को पुकारे
कमरे में बहुत रोज़ से वो बंद पड़ा है
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खड़ा था कौन कहाँ कुछ पता चला ही नहीं
मैं रास्ते में किसी मोड़ पर रुका ही नहीं
मैं रास्ते में किसी मोड़ पर रुका ही नहीं
हवाएँ तेज़ थीं इतनी कि एक दिल के सिवा
कोई चराग़ सर-ए-रहगुज़र जला ही नहीं
कहाँ से ख़ंजर-ओ-शमशीर आज़माता मैं
मिरे अदू से मिरा सामना हुआ ही नहीं
दुखों की आग में हर शख़्स जल के राख हुआ
किसी ग़रीब के दिल से धुआँ उठा ही नहीं
हमारा शहर-ए-तमन्ना बहुत हसीं था मगर
उजड़ के रह गया ऐसा कि फिर बसा ही नहीं
वो बन गया मिरा नाक़िद पता नहीं क्यूँ कर
मिरा कलाम तो उस ने कभी पढ़ा ही नहीं
मैं अपने दौर की आवाज़ था मगर 'ख़ावर'
किसी ने बज़्म-ए-जहाँ में मुझे सुना ही नहीं
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आग ही काश लग गई होती
दो घड़ी को तो रौशनी होती
दो घड़ी को तो रौशनी होती
लोग मिलते न जो नक़ाबों में
कोई सूरत न अजनबी होती
पूछते जिस से अपना नाम ऐसी
शहर में एक तो गली होती
बात कोई कहाँ ख़ुशी की थी
दिल को किस बात की ख़ुशी होती
मौत जब तेरे इख़्तियार में है
मेरे क़ाबू में ज़िंदगी होती
महक उठता नगर नगर 'ख़ावर'
दिल की ख़ुशबू अगर उड़ी होती
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एक परी की ज़ुल्फ़ों में यूँ फँसा हुआ है चाँद
हम को लगता है बादल में छुपा हुआ है चाँद
हम को लगता है बादल में छुपा हुआ है चाँद
पहली शाम नज़र आया था बिल्कुल ऐसा जैसे नाख़ुन
चौदह दिन में देखो कितना बड़ा हुआ है चाँद
उस ने पेड़ से कूद के जाने कितने ग़ोते खाए
बंदर को जब लगा नदी में गिरा हुआ है चाँद
थोड़ा सा नीचे आए तो उस को हम भी छू लें
बत्ती जैसा ये जो ऊपर जला हुआ है चाँद
सच क्या है ये चाँद पे जा कर काश इक दिन मैं देखूँ
सब बतलाते हैं पत्थर का बना हुआ है चाँद
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