Badr-e-Alam Khalish

Badr-e-Alam Khalish

@badr-e-alam-khalish

Badr-e-Alam Khalish shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Badr-e-Alam Khalish's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
क़दमों से इतना दूर किनारा कभी न था
ना-क़ाबिल-ए-उबूर ये दरिया कभी न था

तुम सा हसीं इन आँखों ने देखा कभी न था
लेकिन ये सच नहीं कोई तुम सा कभी न था

है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था

कमरे में दिल के उस के अलावा कोई नहीं
हैरान हूँ कि ऐसा अँधेरा कभी न था

किस ने बिसात-ए-बहस के मोहरे बदल दिए
तन्हा तो था वो पहले भी गूँगा कभी न था

इमरोज़-ए-इंतिज़ार का फ़र्दा तो कल भी है
अंदोह-ए-इमशबी का सवेरा कभी न था

हर ज़ेहन में हमेशा सुलगता है ये सवाल
आख़िर हुआ वो क्यूँ जिसे होना कभी न था

दीवाना था भटक गया गुम हो गया है क़ैस
ख़ाली मगर कजावा-ए-लैला कभी न था

कल भी इसी दयार में था रौशनी का क़हत
ऐसा मगर चराग़ का धंदा कभी न था

पिघली कुछ और बर्फ़ तो इक और शहर-ए-ख़्वाब
यूँ बह गया नशेब में गोया कभी न था

बरसा है किस बबूल पे अब्र-ए-बहार-ख़ेज़
इतना हरा तो ज़ख़्म-ए-तमन्ना कभी न था

उस ने भी इल्तिफ़ात से देखा था कब 'ख़लिश'
मैं ने भी उस के बारे में सोचा कभी न था
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Badr-e-Alam Khalish
आसमाँ पर काले बादल छा गए
घर के अंदर आइने धुँदला गए

क्या ग़ज़ब है एक भी कोयल नहीं
सब बग़ीचे आम के मंजरा गए

घटते बढ़ते फ़ासलों के दरमियाँ
दफ़अ'तन दो रास्ते बल खा गए

डूबता है आ के सूरज उन के पास
वो दरीचे मेरे दिल को भा गए

शहर क्या दुनिया बदल कर देख लो
फिर कहोगे हम तो अब उकता गए

सामने था बे-रुख़ी का आसमाँ
इस लिए वापस ज़मीं पर आ गए

याद आया कुछ गिरा था टूट कर
बे-ख़ुदी में ख़ुद से कल टकरा गए

हुर्मत-ए-लौह-ओ-क़लम जाती रही
किस तरह के लोग अदब में आ गए

हम हैं मुजरिम आप मुल्ज़िम भी नहीं
आप किस अंजाम से घबरा गए

हो गई है शो'ला-ज़न हर शाख़-ए-गुल
बढ़ रहे थे हाथ जो थर्रा गए

धँस गए जो रुक गए थे राह में
देखते थे मुड़ के जो पथरा गए

घर की तन्हाई जब आँगन हो गई
ये सितारे क्या क़यामत ढा गए

थे मुख़ातब जिस्म लहजे बे-शुमार
जाँ-बलब अरमाँ 'ख़लिश' ग़ज़ला गए
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Badr-e-Alam Khalish
कहीं सुब्ह-ओ-शाम के दरमियाँ कहीं माह-ओ-साल के दरमियाँ
ये मिरे वजूद की सल्तनत है अजब ज़वाल के दरमियाँ

अभी सेहन-ए-जाँ में बिछी हुई जो बहार है उसे क्या कहूँ
मैं किसी इ'ताब की ज़द में हूँ तू किसी मलाल के दरमियाँ

हैं किसी इशारे के मुंतज़िर कई शहसवार खड़े हुए
कि हो गर्म फिर कोई मा'रका मिरे ज़ब्त-ए-हाल के दरमियाँ

नहीं तर्जुमान-ए-बयाँ कोई जो है पर्दा-दार-ए-सुकूत है
हैं ये दाग़ दाग़ इबारतें बड़े एहतिमाल के दरमियाँ

यहाँ ज़र्रा ज़र्रा है दीदा-वर नहीं ज़र्रा भर कोई बे-ख़बर
किसी कम-नज़र को पड़ी है क्या पड़े क्यूँ सवाल के दरमियाँ

न रहा धुआँ न है कोई बू लो अब आ गए वो सुराग़-जू
है हर इक निगाह गुरेज़-ख़ू पस-ए-इश्तिआ'ल के दरमियाँ

थे जो पर-कुशा हैं ज़ुबूँ ज़ुबूँ थे जो सर-ब-कफ़ हुए सर-निगूँ
कहीं खो गए दरूँ दरूँ ये किस इन्द्र-जाल के दरमियाँ

लगी ज़र्ब ऐसी है बर-महल कि ये मरहला भी है जाँ-गुसिल
हुए ज़ख़्म फिर से लहू लहू थे जो इंदिमाल के दरमियाँ

कभी शिकवा-ज़न कभी नुक्ता-चीं कभी बाग़ियों का हिमायती
ये 'ख़लिश' है कौन कहो उसे रहे ए'तिदाल के दरमियाँ
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Badr-e-Alam Khalish
गौरय्यों ने जश्न मनाया मेरे आँगन बारिश का
बैठे बैठे आ गई नींद इसरार था ये किसी ख़्वाहिश का

चंद किताबें थोड़े सपने इक कमरे में रहते हैं
मैं भी यहाँ गुंजाइश भर हूँ किस को ख़याल आराइश का

ठहर ठहर कर कौंद रही थी बिजली बाहर जंगल में
ट्रेन रुकी तो सरपट हो गया घोड़ा वक़्त की ताज़िश का

टीस पुराने ज़ख़्मों की थी नींद उचट गई आँखों से
भीग रहा था करवट करवट गोशा गोशा बालिश का

किसी के दिल पर दस्तक दूँगा किसी के ग़म का दुखड़ा हूँ
सुनने वाले समझ रहे हैं नग़्मा हूँ फ़रमाइश का

सर के ऊपर ख़ाक उड़ी तो सब दिल थाम के बैठ गए
ख़बर नहीं थी गुज़र चुका है मौसम अब्र-ए-नवाज़िश का

रेंग रही थीं अमर-लताएँ छुप छुप कर शादाबी में
उर्यां होती शाख़ों से अब भरम खुला ज़ेबाइश का

अपनी ही धुन में मगन रहता है सच्चे सुर का साज़िंदा
जैसे कि मैं हूँ मतवाला ख़ुद अपने तर्ज़-ए-निगारिश का

क़दम क़दम है वीराना कहीं और 'ख़लिश' अब क्या जाना
वर्ना शौक़ मुझे भी कल था सहरा की पैमाइश का
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Badr-e-Alam Khalish
निशान-ए-ज़ख़्म पे निश्तर-ज़नी जो होने लगी
लहू में ज़ुल्मत-ए-शब उँगलियाँ भिगोने लगी

हुआ वो जश्न कि नेज़े बुलंद होने लगे
नियाम तेग़ की ख़ंजर के साथ सोने लगी

जहाँ में दौड़ के पहुँचा था वो घनेरी छाँव
ज़रा सी देर में ज़ार-ओ-क़तार रोने लगी

नदी डुबाऊ न थी डूबना पड़ा लेकिन
किनारे पहुँचा तो शर्मिंदगी डुबोने लगी

सब अपनी प्यास बुझाने में महव थे हमा-तन
हुआ ये फिर कि हवा शो'ला-ख़ेज़ होने लगी

बढ़ाए हाथ मदद को दराज़ दस्तों ने
तो अपना बोझ वो च्यूँटी की तरह ढोने लगी

कुछ और सुर्ख़-रू हो कर उठे वो मक़्तल से
घटा भी उट्ठी तो दामन के दाग़ धोने लगी

वो पीर-ज़न जिसे काँटे निकालने थे 'ख़लिश'
वो साहिरा की तरह सूइयाँ चुभोने लगी
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Badr-e-Alam Khalish
गुम हुए जाते हैं धड़कन के निशाँ हम-नफ़सो
है दर-ए-दिल पे कोई संग-ए-गिराँ हम-नफ़सो

रिसने लगती हैं जब आँखों से तेज़ाबी यादें
बात करते हुए जलती है ज़बाँ हम-नफ़सो

दिल से लब तक कोई कोहराम सा सन्नाटा है
ख़ुद-कलामी मुझे ले आई कहाँ हम-नफ़सो

इक सुबुक मौज है इक लौह-ए-दरख़्शाँ पे रवाँ
है तमाशाई यहाँ सारा जहाँ हम-नफ़सो

कितने मसरूफ़ हैं मसरूर नहीं फिर भी ये लोग
है ये क्या सिलसिला-ए-कार-ए-ज़ियाँ हम-नफ़सो

शाम तम्हीद-ए-ग़ज़ल रात है तकमील-ए-ग़ज़ल
दिन निकलते ही निकल जाती है जाँ हम-नफ़सो

रश्क-ए-महशर कोई क़ामत तो निगाहों में जचे
दिल में बाक़ी है अभी ताब-ओ-तवाँ हम-नफ़सो

ज़िंदा हो रस्म-ए-जुनूँ किस की नवा-रेज़ी से
अब रहा कौन यहाँ शो'ला-ब-जाँ हम-नफ़सो

आज की शाम ग़ज़ल क्यूँ न 'ख़लिश' से ही सुनें
ढूँड कर लाए कोई है वो कहाँ हम-नफ़सो
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Badr-e-Alam Khalish
दमक उठी है फ़ज़ा माहताब-ए-ख़्वाब के साथ
धड़क रहा है ये दिल किस रबाब-ए-ख़्वाब के साथ

हटे ग़ुबार जो लौ से तो मेरी जोत जगे
जलूँ मैं फिर से नई आब-ओ-ताब-ए-ख़्वाब के साथ

है सौ अदाओं से उर्यां फ़रेब-ए-रंग-ए-अना
बरहना होती है लेकिन हिजाब-ए-ख़्वाब के साथ

तो क्यूँ सज़ा में हो तन्हा गुनाहगार कोई
यहाँ तो जीते हैं सब इर्तिकाब-ए-ख़्वाब के साथ

शरार-ए-संग से संगलाख़ हो गए तलवे
हुआ न कुछ दिल-ए-ख़ाना-ख़राब-ए-ख़्वाब के साथ

सुलाये रक्खा हमें भी फ़रेब-ए-मंज़िल ने
चले थे हम भी किसी हम-रकाब-ए-ख़्वाब के साथ

सुराग़ मिलता नहीं प्यास के सफ़ीनों का
भँवर भी होते हैं शायद सराब-ए-ख़्वाब के साथ

हक़ीक़तों की चटानों पे चल गया जादू
लो वो भी चलने लगीं अब सहाब-ए-ख़्वाब के साथ

अजब नहीं वही मंज़र नज़ारा बन जाए
डरा रहा है ये डर इज़्तिराब-ए-ख़्वाब के साथ

दराड़ें रह गईं बेदारियों के नक़्शे पर
न हम रहे न वो तुम इंक़लाब-ए-ख़्वाब के साथ

निगाह-ए-दीदा-ए-ता'बीर के हवाले 'ख़लिश'
है ये बयाज़ अलग इंतिख़ाब-ए-ख़्वाब के साथ
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Badr-e-Alam Khalish
ज़रूरतों की हमाहमी में जो राह चलते भी टोकती है वो शाइ'री है
मैं जिस से आँखें चुरा रहा हूँ जो मेरी नींदें चुरा रही है वो शाइ'री है

जो आग सीने में पल रही है मचल रही है बयाँ भी हो तो अयाँ न होगी
मगर इन आँखों के आबलों में जो जल रही है पिघल रही है वो शाइ'री है

था इक तलातुम मय-ए-तख़य्युल के जाम-ओ-ख़ुम में तो जल-तरंगों पे छिड़ गई धुन
जो पर्दा-दार-ए-नशात-ए-ग़म है जो ज़ख़्मा-कार-ए-नवा-गरी है वो शाइ'री है

यहाँ तो हर दिन है इक सुनामी है एक जैसी हर इक कहानी तो क्या सुनोगे
मगर वो इक ख़स्ता-हाल कश्ती जो मिस्ल-ए-लाशा पड़ी हुई है वो शाइ'री है

है बादलों के सियाह घोड़ों के साथ वर्ना हवा की परछाईं किस ने देखी
धुली धुली धूप के बदन पर जो छाँव जैसी सुबुक-रवी है वो शाइ'री है

वही तो कल सुरमई चटानों के दरमियाँ से गुज़र रही थी बिफर रही थी
वही नदी अब थकी थकी सी जो रेत बन कर बिखर गई है वो शाइ'री है

घड़ी की टिक-टिक दिलों की धक धक से बात करती अगर तनफ़्फ़ुस मुख़िल न होता
तो ऐसी शिद्दत की गू-मगू में जो हम-कलामी की ख़ामुशी है वो शाइ'री है

जो क़हक़हों और क़ुमक़ुमों से सजी-धजी है उसी गली से गुज़र के देखो
अँधेरे ज़ीनों पे सर-ब-ज़ानू जो बेकसी ख़ून थूकती है वो शाइ'री है

न हिजरतों के हैं दाग़ बाक़ी न अपनी गुम-गश्तगी का कोई सुराग़ बाक़ी
सो अब जो तारी है सोगवारी जो अपनी फ़ितरत से मातमी है वो शाइ'री है

है लाला-ज़ार-ए-उफ़ुक़ से आगे अभी जो धुँदला सा इक सितारा है इस्तिआ'रा
जो होगी तीरा-शबी में रौशन वो कोई ज़ोहरा न मुश्तरी है वो शाइ'री है

गुज़श्तगानी है ज़िंदगानी न ये हवा है न है ये पानी फ़क़त रवानी
जो वाक़िआ'ती है वो है क़िस्सा जो वाक़ई है वो शाइ'री

जो हुस्न-ए-मंज़र है कैनवस पर वो रंगरेज़ी नहीं बरश की तो और क्या है
अब इस से आगे कोई नज़र जिस जहान-ए-मा'नी को ढूँढती है वो शाइ'री है

ये शेर-गोई वो ख़ुद-फ़रामोश कैफ़ियत है जहाँ ख़ुदी का गुज़र नहीं है
ख़ुदी की बाज़-आवरी से पहले जो बे-ख़ुदी की ख़ुद-आगही है वो शाइ'री है

जो वारदाती सदाक़तों की अलामतें हैं हदीस-ए-दिल की रिवायतें हैं
उसी अमानत को जो हमेशा सँभालती है सँवारती है वो शाइ'री है

अना के दम से है नाज़-ए-हस्ती अना के जल्वों का आईना-दार है हर इक फ़न
वो ख़ुद-नुमाई जो ख़ुशनुमा है मगर जो थोड़ी सी नर्गिसी है वो शाइ'री है

जो बात नसरी है नज़रियाती है जदलियाती है वो मुकम्मल कभी न होगी
मगर जो मुज्मल है और मौज़ूँ है और हतमी और आख़िरी है वो शाइ'री है

तिजारतों की सियासतें अब अदब की ख़िदमत-गुज़ारियों में लगी हुई हैं
जो जी रहा है जो गा रहा है मुशाएरा है जो मर रही है वो शाइ'री है

जो दीदा-रेज़ी भी जाँ-गुदाज़ी के साथ होगी तो लफ़्ज़ सारे गुहर बनेंगे
'ख़लिश' यक़ीनन ये सिर्फ़ ज़ोर-ए-क़लम नहीं है जो शाइ'री है वो शाइ'री है
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