अपना दुखड़ा कहते हैं
    और तुझे क्या कहते हैं

    कच्ची कोंपल होता है
    प्यार का रिश्ता कहते हैं

    दुनिया किस की अपनी है
    अहल-ए-दुनिया कहते हैं

    ऐ दिल ये दर-मांदगियाँ
    तुझ को दरिया कहते हैं

    अपना सा बस लगता है
    जिस को अपना कहते हैं

    लूटने वाले! देर न कर
    लूट के ले जा कहते हैं

    'गौहर' लोग तो बात नहीं
    बात का सेहरा कहते हैं
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    उजले मैले पेश हुए
    जैसे हम थे पेश हुए

    आया कौन कटहरों में
    साथ कटहरे पेश हुए

    अपने सारे झूट खुले
    किस के आगे पेश हुए

    अंदाज़े जब हार गए
    फिर मफ़्रूज़े पेश हुए

    शाह को शायद मात हुई
    शाह के मोहरे पेश हुए

    अद्ल का चश्मा सूख गया
    अद्ल के प्यासे पेश हुए

    हम भी शायद साफ़ न थे
    डरते डरते पेश हुए

    लुत्फ़ तो उस दिन आएगा
    जिस दिन खाते पेश हुए

    'गौहर' क्या ताज़ीर लगी
    बाक़ी पर्चे पेश हुए
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    यहाँ कौन इस के सिवा रह गया
    ज़माना गया आइना रह गया

    वो हुस्न-ए-सरापा वो हुस्न-आफ़रीं
    मगर हर कोई देखता रह गया

    चलो क्या हुआ रौशनी ही तो थी
    यहाँ देखने को भी क्या रह गया

    हमारी कुछ अपनी रिवायत भी थी
    किताबों में लिक्खा हुआ रह गया

    ख़ुदाई को भी हम न ख़ुश रख सके
    ख़ुदा भी ख़फ़ा का ख़फ़ा रह गया

    मुक़द्दर कहीं कज-कुलाही करे
    कोई घर में महव-ए-दुआ रह गया

    कहीं एक चुप भी रसा हो गई
    कोई बोलता बोलता रह गया
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    सर पर कोई आसमान रख दे
    इक मुँह में मगर ज़बान रख दे

    सुल्ह नहीं सलाम तो ले
    ये तीर चढ़ी कमान रख दे

    इतना भी न बे-लिहाज़ हो जा
    थोड़ा सा तो ख़ुश-गुमान रख दे

    तुझ को तिरी हिकमतें मुबारक
    इक हाथ पे इक जहान रख दे

    फिर हम को गदा-ए-रह बना कर
    रह में कोई इम्तिहान रख दे

    तफ़्सील कहीं गराँ न पड़ जाए
    इक हर्फ़ में दास्तान रख दे

    अब ध्यान की बात छिड़ गई तो
    कुछ इस से अलग भी ध्यान रख दे
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    दरिया में ये नाव किस तरफ़ है
    पानी का बहाव किस तरफ़ है

    ये राह किधर को मुड़ रही है
    लोगों का लगाव किस तरफ़ है

    मंज़िल कहाँ ताकते हैं राही
    तकते हैं पड़ाव किस तरफ़ है

    तासीर कहाँ गई सुख़न से
    जज़्बों का अलाव किस तरफ़ है

    आवाज़ कहीं बुला रही है
    यारों का रिझाव किस तरफ़ है

    तस्वीर दिखा रही है क्या कुछ
    रंगों का रचाओ किस तरफ़ है

    खोए हुए तुम कहाँ हो 'गौहर'
    दिल का ये खिंचाव किस तरफ़ है
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    मरहला तय कोई बे-मिन्नत-ए-जादा भी तो हो
    ग़म बढ़े भी तो सही दर्द ज़ियादा भी तो हो

    ऐसी मुश्किल तो नहीं दश्त-ए-वफ़ा की तस्ख़ीर
    सर में सौदा भी तो हो दिल में इरादा भी तो हो

    ज़ेहन का मश्वरा-ए-तर्क-ए-तलब भी बर-हक़
    ज़ेहन की बात क़ुबूल-ए-दिल-ए-सादा भी तो हो

    कहीं बादल कहीं सूरज कहीं साया कहीं धूप
    मिरे माबूद तिरा कोई लबादा भी तो हो

    प्यार में कम तो नहीं कम-निगही भी उस की
    हाँ तुनक-ज़र्फ़ी-ए-एहसास कुशादा भी तो हो

    आशिक़ी सरमद-ओ-मंसूर से कुछ ख़ास नहीं
    मस्त लेकिन कोई बे-ज़हमत-ए-बादा भी तो हो

    ज़र्फ़-ए-ईज़ा-तलबी ग़म भी परख लें 'गौहर'
    उस से इक रोज़ न मिलने का इरादा भी तो हो
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    बंदों का मिज़ाज हम ने देखा
    क्या कुछ नहीं आज हम ने देखा

    हिलते हुए तख़्त को सँभालो
    गिरता हुआ ताज हम ने देखा

    जीते तो ख़ुशी से मर न जाते
    किस शख़्स का राज हम ने देखा

    क्या क्या न तरस तरस गए हम
    क्या क्या न समाज हम ने देखा

    रोए हैं तो लोग रो पड़े हैं
    अब के तो रिवाज हम ने देखा

    'गौहर' को सलाम-ए-शौक़ पहुँचे
    कुछ काम न काज हम ने देखा
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    कैसे डूबा डूब गया
    डूबने वाला डूब गया

    कैसी नेक कमाई थी!
    पैसा पैसा डूब गया

    नाव न डूबी दरिया में
    नाव में दरिया डूब गया

    लोग किनारे आन लगे
    और किनारा डूब गया

    बारिश उस ने भेजी थी
    शहर हमारा डूब गया

    सारी रात बिता डाली
    तारा तारा डूब गया

    'गौहर' पूरा ख़्वाब सुना
    पानी में क्या डूब गया
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    जाती रुत से प्यार करोगे
    कर लो बात उधार करोगे

    तब मिल कर एहसान किया था
    अब मिल कर ईसार करोगे

    जितने ख़्वाब उतनी ताबीरें
    कितने दाग़ शुमार करोगे

    ऐ इनकार के ख़ूगर लोगों
    और भी कोई वार करोगे

    उस के नाम को नाव बना कर
    प्यासों को सरशार करोगे

    फ़र्ज़ करो हम मर न सके तो
    जीने से इनकार करोगे

    फ़र्ज़ करो हम हार गए तो
    क़ब्र कहाँ तय्यार करोगे
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    दुखी दिलों में, दुखी साथियों में रहते थे
    ये और बात कि हम मुस्कुरा भी लेते थे

    वो एक शख़्स बुराई पे तुल गया तो चलो
    सवाल ये है कि हम भी कहाँ फ़रिश्ते थे

    और अब न आँख न आँसू न धड़कनें दिल में
    तुम्हीं कहो कि ये दरिया कभी उतरते थे

    जुदाइयों की घड़ी नक़्श नक़्श बोलती है
    वो बर्फ़-बार हवा थी, वो दाँत बजते थे

    अब इन की गूँज यहाँ तक सुनाई देती है
    वो क़हक़हे जो तिरी अंजुमन में लगते थे

    वो एक दिन कि मोहब्बत का दिन कहें जिस को
    कि आग थी न तपिश बस सुलगते जाते थे

    कहाँ वो ज़ब्त के दा'वे कहाँ ये हम 'गौहर'
    कि टूटते थे न फिर टूट कर बिखरते थे
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