Jameel ur Rahman

Jameel ur Rahman

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Jameel ur Rahman shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jameel ur Rahman's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Shayari
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  • Nazm
परिंदों से सबक़ सीखा शजर से गुफ़्तुगू की है
सवाद-ए-जाँ की ख़ामोशी में ठहरे
अब्र-ए-तन्हाई की ऊदी ज़र्द चादर पर
शुआ-ए-याद के हाथों लिखी हर बे-नवा लम्हे की पूरी दास्ताँ
मैं ने पढ़ी है

नशात-अंगेज़ रातों और ख़्वाबों के शफ़क़-आलूद चेहरे को
झुलसते दिन की ख़ीरा-कुन फ़ज़ा में
एक उम्र-ए-राएगाँ के आइने में महव हो कर कब नहीं देखा
बरस गुज़रे रुतें बीती वतन से बे-वतन होने की सारी बेबसी झेली
मैं बर्फ़ानी इलाक़ों मर्ग़-ज़ारों वादियों और रेगज़ारों से
निशान-ए-कारवाँ चुनता सदा-ए-रफ़्तगाँ सुनता हुआ गुज़रा
कहाँ मुमकिन था लेकिन मैं ने जो देखा सुना वो याद रक्खा अजब ये है
नहीं गर हाफ़िज़े में कुछ तो वो इक नाम है तेरा
ख़बर कब थी कि बहती उम्र की सरकश रवानी में
मुझे जो याद रहना चाहिए था
मैं वही इक नाम भूलूँगा
परिंदों और पेड़ों से जहाँ भी गुफ़्तुगू होगी
तुम्हारा ज़िक्र आते ही धुँदलके
ज़ेहन में इक मौजा-ए-तारीक बन कर फैलते जाएँगे
और ये हाफ़िज़ा मफ़्लूज आँखों से मुझे
घूरेगा चिल्लाएगा
ख़ौफ़-ए-ख़ुद-फ़रामोशी से तुम डरते थे लेकिन अब
मआल-ए-ख़ुद-फ़रामोशी से तुम कैसे निभाओगे
ग़ुबार अंदर ग़ुबार अंगड़ाइयाँ लेते हुए
रस्ते में जो कुछ खो चुके हो उस को कैसे ढूँड पाओगे
ये लाज़िम तो नहीं है, एक अन-बूझी पहेली जब अचानक याद आ जाए
उसे हर हाल में हर बार बूझोगे
तुम अपने आप से कब तक किसी का नाम पूछोगे
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Jameel ur Rahman
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रंगों और ख़ुशबुओं की तख़्लीक़ से पहले
मरने वाले लम्हे की नम आँखों से
आइंदा के ख़्वाबों की उर्यानी का दुख झाँक रहा था
ख़त-ए-शुऊर से आज अगर हम
उस लम्हे की सम्त कभी देखें तो रूह में जागती
गीली मिट्टी की आवाज़ सुनाई देती है

ये दुनिया तो मिटे हुए उस दाएरे की सूरत का अक्स है
जिस में सोचों आँखों और हर्फ़ों के लाखों दाएरे लर्ज़ां हैं
चारों जानिब ख़ुशबुओं के आँगन में जलते हुए रंगों की लहरें
हवा की डोर से बंधी हुई ऐसी कठ-पुतलियाँ हैं
जो अपने जनम की साअत से इस पल तक
चुप की लय पर नाच रही हैं
जाने कब से उर्यां ख़्वाबों का पैराहन पहने
आते जाते लम्हों पर चिल्लाती हैं

देखो ग़ौर से देखो
ये उर्यानी मख़्फ़ी और ज़ाहिर में ज़िंदा राब्ते की ख़ातिर
अपनी अस्ल की जानिब झुकते इंसानों के
वस्ल-तलब-जज़्बों की तरह सवाली हैं
बाक़ी दाएरे ख़ाली हैं
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Jameel ur Rahman
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हादसे ज़िंदगी की अलामत हैं लेकिन वो इक हादसा
हम जिसे मौत कहते हैं
कब और कैसे कहाँ रू-नुमा हो कोई जानता है
बिला-रैब कोई नहीं जानता
मैं ख़ुद सोचता हूँ मुझे एक मुद्दत से क्या हो गया है
मेरे फैले हुए जागते ज़िंदा हाथों की सब उँगलियाँ सो चुकी हैं
मेरे लर्ज़ां लबों पर जमी पपड़ियाँ बर्क़ से राख होते हुए अब्र पर रो चुकी हैं
इल्म ओ इरफ़ान की राह में जैसे मेरी दुआएँ असर खो चुकी हैं
मैं क्या जानता हूँ
फ़ना के तसलसुल में कोई गिरह डालने के लिए
हर्फ़-ए-कुन की ज़रूरत है जो माँगने पर भी कोई न देगा
कि अब वो ज़मानों से बहते हुए ख़ून का ख़ूँ-बहा तो नहीं है
वो जिस के तसर्रुफ़ में सब कुछ है
हुस्न-ए-तलब की मुझे दाद दे कर अगर ये कहे
ख़ूब हो तुम मगर जानते हो कि तुम कौन हो
तुम रह-ए-रफ़्तगाँ की मसाफ़त का इक और आग़ाज़ हो इंतिहा तो नहीं हो
अदम और मौजूद के दरमियाँ इक कड़ी हो ख़ुदा तो नहीं हो
तो मैं क्या कहूँगा मैं ख़ुद सोचता हूँ
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