सिर्फ़ हमारा शहर ही नहीं जला
    जल गई हमारी रेशमी तहज़ीब भी
    अब इन ही चिंगारियों से
    रह रह कर सुलग उठती है
    कोमल मन में
    नफ़रत की ज्वाला
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    Kahkashan Tabassum
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    हमें ख़ानों में मत बाँटो
    कि हम तो रौशनी ठहरे
    किसी दहलीज़ पर जलते हुए शब भर
    किसी का रास्ता तकते
    चराग़ों से भी आगे है जहाँ अपना
    उजालों की कुमक ले कर
    अंधेरे की सफ़ों को चीर जाते हैं
    ये जुगनू चाँद और तारे
    हमारी सूरतें जैसे
    हमें ख़ानों में मत बाँटो
    हवा हैं हम
    भला दीवार-ओ-दर में क़ैद क्या होंगे
    सुनहरी सुब्ह ढलती शाम की राहत हमीं से है
    हमें मीज़ान पर रखने से पहले
    तोलने से क़ब्ल इतना सोच लेना है
    हमारा बोझ तेरी बंद मुट्ठी में दबी रस्सी
    उठाएगी भला कैसे
    कि हम तो शश-जिहत में
    जिस तरफ़ नज़रें उठाओ
    देख लो फैली हुई बिखरी हुई हम को
    कि हम तो ज़िंदगी हैं
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    Kahkashan Tabassum
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    गढ़ो मत चाक पे रख के
    कोई कूज़ा सुराही या घड़ा प्याला
    तुम्हारी सोच के ये नक़्श हैं सारे
    तुम्हारी ख़्वाहिशों के रंग भर दिलकश
    हमें मिट्टी ही रहने दो
    हमें कब चाहिए ऐसी अता
    बख़्शी हुई सूरत
    हमें मिट्टी ही रहने दो
    जो नम बारिश से हो
    ज़रख़ेज़ हो फ़स्लें उगाती हो
    ज़रा सी बीज को पौदा बनाती हो
    कि वो पौदा शजर बन कर
    तुम्हारी रहगुज़र को छाँव देता है
    वही रस्ता तुम्हारी मंज़िलें आसान करता है
    हमें मिट्टी ही रहने दो
    नुमाइश के सजावट के
    हमें सामान क्यूँ होना
    नुमू से क्यूँ हमें महरूम करते हो
    तुम्हारे पाँव के नीचे ज़मीं क़ाएम रहे जानाँ
    हमें मिट्टी ही रहने दो
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    Kahkashan Tabassum
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    हज़ारों सदियाँ गुज़र चुकी हैं
    किसी समय में वो थी सतवंती
    कहीं सावित्री
    कहीं थी मीरा
    हर एक युग में
    अक़ीदतों की लहर में भीगी
    तपस्या के सेहर में गुम-सुम
    रिवायतों के नशे में डूबी
    तुम्हारे क़दमों की गर्द को वो तिलक बनाती
    दिए जलाती थी नक़्श-ए-पा पर
    जनम जनम का अटूट रिश्ता
    निबाहे जाती
    हज़ारों सदियों सफ़र किया है
    नज़र जमाए
    तुम्हारे पीछे
    तुम्हारे दुख पर दुखी हुई है
    तुम्हारे सुख पर सुखी हुई है
    मगर बताओ
    हज़ारों सदियों के दरमियाँ कोई ऐसा लम्हा
    जो तुम ने इस के लिए जिया हो
    सिवाए आँसू के कोई जुगनू
    कभी जो आँचल में जड़ दिया हो
    पुराने बरगद पे एक धागा
    कहीं तो उस के भी नाम का हो
    अँधेरी ताक़ों पे उस की ख़ातिर
    रखा हुआ भी तो इक दिया हो
    नहीं है कुछ भी
    कहीं नहीं है
    वो अपनी तारीख़ में तुम्हारा
    लिखे भी गर नाम
    किस तरह से
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    Kahkashan Tabassum
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    फिर मौसम-ए-यख़-बस्ता बदलने की ख़बर दे
    रग रग में जमी बर्फ़ पिघलने की ख़बर दे

    या दिल के चराग़ों को लहू और अता कर
    या राह में फिर चाँद निकलने की ख़बर दे

    या मौसम-ए-ख़ुश-रंग कोई भेज ज़मीं पर
    या गर्दिश-ए-अफ़्लाक बदलने की ख़बर दे

    बस उड़ते बगूले हैं सराबों के सफ़र में
    एड़ी कोई चश्में के उबलने की ख़बर दे

    दर बंद किए लोग घरों में हैं मुक़य्यद
    आसेब-ज़दा रात के ढलने की ख़बर दे

    भीगी हुई लकड़ी हूँ धुआँ देती हूँ पहरों
    अब मुझ को मिरी आग में जलने की ख़बर दे

    अख़बार भी दहशत का तराशा है 'तबस्सुम'
    हर सुब्ह फ़क़त दिल के दहलने की ख़बर दे
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    Kahkashan Tabassum
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    लहू की मौज में जीना मिरे हिस्से में आया है
    भँवर बनता हुआ दरिया मिरे हिस्से में आया है

    सुनहरी अहद-ए-माज़ी की रिवायत हम से थी लेकिन
    फ़क़त दीमक लगा पन्ना मिरे हिस्से में आया है

    परिंदे आशियाना छोड़ के किस सम्त जा निकले
    दुखों का इक शजर तन्हा मिरे हिस्से में आया है

    रुपहली चाँदनी उस को अमीर-ए-शहर की बख़्शिश
    सुलगती धूप का सहरा मिरे हिस्से में आया है

    दरीचे खोल के भी रुत का अंदाज़ा न कर पाऊँ
    अजब दहशत-ज़दा लम्हा मिरे हिस्से में आया है

    'तबस्सुम' हाथ में जुगनू लिए दर-दर भटकती हूँ
    कि घाइल रात का नौहा मिरे हिस्से में आया है
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    माँगे है इक सितारा सर-ए-आसमान फिर
    दिल को ये ज़िद कि सू-ए-उफ़ुक़ हो उड़ान फिर

    अब ऐ क़फ़स नशीनों उठाओ दुआ को हाथ
    है शाख़-शाख़ मौसम-ए-वहम-ओ-गुमान फिर

    हर लम्हा किस महाज़ की जानिब सफ़र में है
    खींचे हुए रगों में लहू की कमान फिर

    दरियाओं का ये चुप तो ख़तरनाक है बहुत
    बाँधो बुलंद शाख़ पर लोगों मचान फिर

    पहले ख़िराज माँग रहा है अमीर-ए-वक़्त
    लौटाएगा वो शहर में अम्न-ओ-अमान फिर

    दिल तंग हो गया तो ज़मीं भी हुई है तंग
    हम ख़्वाब के नगर में बनाएँ मकान फिर

    इन हिचकियों का कुछ तो सबब होगा 'कहकशाँ'
    शायद किसी को आया कहीं मेरा ध्यान फिर
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    Kahkashan Tabassum
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    मौसम ख़ुशबू रंग धनक के मंज़र सारे उस के थे
    रात की काली छाया मेरी चाँद सितारे उस के थे

    बीच समुंदर बख़्त हमारा साहिल तक ये आता कब
    मौज-ए-हवा पे नाम था उस का दूर किनारे उस के थे

    सहमी सहमी गूँगी बहरी एक गुजरिया मेरी थी
    हँसते गाते धूल उड़ाते राज-दुलारे उस के थे

    इक छोटी सी छत की ख़ातिर क्या क्या ख़्वाब गँवा बैठी
    भूल गई कि ईंटें उस की मिट्टी गारे उस के थे

    ज़ंजीरों के बदले अब भी गहने पाती हूँ जैसे
    सदियों से ये जब्र के बंधन बीच हमारे उस के थे

    कितनी अजब तक़्सीम 'तबस्सुम' करती है ये दुनिया भी
    मेरा हिस्सा ज़हर-ए-हलाहल अमृत धारे उस के थे
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    Kahkashan Tabassum
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    हज़ारों साल बीते
    मिरी ज़रख़ेज़ धरती के सिंघासन पर
    बिराजे देवताओं के सरापे साँवले थे
    मगर उस वक़्त भी कुछ हुस्न का मेआ'र ऊँचा था
    हिमाला की हसीं बेटी उन्हें भाई
    बृन्दाबन की धरती पर
    थिरकती नाचती राधा
    बसी थी कृष्ण के दिल में

    उन्हें भी हुस्न की मन-मोहनी मूरत पसंद आई
    मगर उन को ख़ुदा होते हुए भी ये ख़बर कब थी
    कि उन की आने वाली नस्ल पर उन का सरापा
    बहुत गहरा असर है छोड़ने वाला
    हज़ारों साल बीते
    मगर अब भी हमारी साँवली रंगत
    तिरा वरदान हो गोया

    हमारा हम-सफ़र भी किसी पारो
    किसी राधा का अंधा ख़्वाब
    आँखों में बसाए
    लिए कश्कोल हाथों में
    फिरे बस्ती की गलियों में
    हम अब किस ज़ो'म में पूजा की थाली में
    दिए रख कर
    तिरी चौखट पे आएँ
    सर झुकाएँ
    उतारें आरती तेरी
    हमारे बख़्त पर तेरा ये श्यामल रंग
    इक आसेब की सूरत मुसल्लत है
    हम अब तो डर के मारे
    आइनों से मुँह छुपाए फिर रहे हैं
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    Kahkashan Tabassum
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