माँगे है इक सितारा सर-ए-आसमान फिर

दिल को ये ज़िद कि सू-ए-उफ़ुक़ हो उड़ान फिर

अब ऐ क़फ़स नशीनों उठाओ दुआ को हाथ
है शाख़-शाख़ मौसम-ए-वहम-ओ-गुमान फिर

हर लम्हा किस महाज़ की जानिब सफ़र में है
खींचे हुए रगों में लहू की कमान फिर

दरियाओं का ये चुप तो ख़तरनाक है बहुत
बाँधो बुलंद शाख़ पर लोगों मचान फिर

पहले ख़िराज माँग रहा है अमीर-ए-वक़्त
लौटाएगा वो शहर में अम्न-ओ-अमान फिर

दिल तंग हो गया तो ज़मीं भी हुई है तंग
हम ख़्वाब के नगर में बनाएँ मकान फिर

इन हिचकियों का कुछ तो सबब होगा 'कहकशाँ'
शायद किसी को आया कहीं मेरा ध्यान फिर

— Kahkashan Tabassum

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Ibaadat Shayari

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