Jalaal

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@kklovwat

Jalaal shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jalaal's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
तीरगी तो क़िस्मत में लफ़्ज़-ए-जावेदानी है
सो मेरी चराग़ों से दुश्मनी पुरानी है

आज हम बिछड़ जाएँ कल ये बात सोचेंगे
कौन ज़िंदा रहता है किस की जान जानी है
इश्क़ का हो मैदाँ तो याद ये सबक़ रखना
पहले वार करना है फिर सिपर उठानी है

आशिक़-ए-जुनूँ से ही ये जमाल है वरना
शोख़ियाँ हैं बे-रंगी हुस्न बे-मआ'नी है

अब तेरा तजस्सुस भी रायगाँ ही जाएगा
बात जो बतानी थी अब नहीं बतानी है

इसलिए किया मैं ने मुस्तक़िल सफ़र अपना
मंज़िलें नहीं गरचे ख़ाक तो उड़ानी है

आज ताना-ज़न हैं तो ताने मार लेते हैं
वक़्त सब बता देगा जो भी बद-गुमानी है

नीम-शब भी रातों में मुस्तक़िल जगे रहना
कुछ नहीं है बस तेरे ग़म की पासबानी है

ग़लतियाँ तो होती हैं ये गुनाह है शायद
जिस को भूल जाना था याद वो ज़बानी है

आज रात कर डालूँ अपना क़त्ल ख़्वाबों में
सुब्ह होने से पहले नींद टूट जानी है

सब की ज़िंदगी अपनी सब के फै़सले अपने
कुछ को शौक़ से जीनी कुछ को बस बितानी है

अहल-ए-दिल ये सारे क्यूँँ सोगवार होते हैं
दिल के टूट जाने की मुख़्तसर कहानी है

उस का ग़म मनाने से ये हुसूल है निकला
अब 'जलाल' ग़ज़लों में कुछ नई रवानी है
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मुझ को ग़ैरत का तो एहसास दिला दे कोई
कुफ़्र की नींद से आकर के जगा दे कोई

अगली नस्लें न मोहब्बत को मसीहाई कहें
अब तो तारीख़ के पन्नों को जला दे कोई

ख़ौफ़ तारी न हुआ सानेहे गुज़रे भी बहुत
मुझ को हैरत भी नहीं ख़ैर भुला दे कोई

ये अजब बात नहीं ख़ुद से चुराऊॅं नज़रें
मुझ को मेरी ही हक़ीक़त जो बता दे कोई

तेरे दिल का मैं बशर आज तेरे क़दमों में
अपना मेयार बता कितना गिरा दे कोई

ख़ुद के रोने की वजाहत मैं तुझे क्या देता
जुज़ तेरे हक़ न दिया मुझ को रुला दे कोई

अच्छा ख़ासा मैं उदासी में मगन रहता हूॅं
जाम-ए-इशरत न मुझे ला के पिला दे कोई

अब सकत है न मेरी जीने की चाहत ही रही
हो सके तो ये मेरी उम्र बिता दे कोई

सोग जिस को भी मनाना है मोहब्बत का 'जलाल'
मेरी मज्लिस का उसे जा के पता दे कोई
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ख़लिश बन कर तेरी उल्फ़त मेरे सीने में रहती है
जुनूँ की बदमिज़ाजी इसलिए लहजे में रहती है

मुझे गुमराह करती है ये चेहरों की अदाकारी
हक़ीक़त आज भी गोया किसी पर्दे में रहती है

गुमाँ जैसा हो जितना हो यक़ीनन टूट जाएगा
ख़ुमारी कब तलक शामिल किसी नश्शे में रहती है

तेरी यादें कसक बन कर रवाँ रहती हैं अश्कों में
सहूलत तू समझता है मुझे रोने में रहती है

बुरा क्या मानना बर्ताव का तेरे बिछड़ने पर
ज़रा जुरअत बग़ावत की हर इक रिश्ते में रहती है

यही कुछ सोच कर भी मैं शिकायत अब नहीं करता
वजाहत की नई पर्ची तेरे बस्ते में रहती है

चल आ इक दिन मिला दूॅं मैं तुझे ऐ ज़िंदगी इस से
उदासी है तेरी सौतन मेरे कमरे में रहती है
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बातों से तेरी तुझ को मुकरने नहीं दूँगा
इल्ज़ाम कोई सर मेरे धरने नहीं दूँगा

बर्बाद करूँँगा मैं तेरे सामने ख़ुद को
और आह भी तुझ को कभी भरने नहीं दूँगा

गर ज़हर सिफ़त है ये मोहब्बत का नशा तो
ये ज़हर कभी रग में उतरने नहीं दूँगा

अश'आर मेरे दिल में तेरे नक़्श रहेंगे
ख़ुद को मैं तुझे यूँँ ही बिसरने नहीं दूँगा

ख़ुद को न सँवारूँगा किसी दाम में आकर
ता-उम्र तुझे भी मैं सँवरने नहीं दूँगा

मैं ख़ुद ही कुरेदूँगा इसे फ़ुर्सत-ए-लम्हात
ये ज़ख़्म-ए-जिगर मैं कभी भरने नहीं दूँगा

जिस को भी रखा दिल में उसी ने इसे तोड़ा
अब दिल में किसी को भी उतरने नहीं दूँगा

जिस दिल में मुक़ीम अब मुझे ठुकरा के हुए हो
उस दिल में तुम्हें भी मैं ठहरने नहीं दूँगा

आमादा करूँँगा मैं तुम्हें जंग पे इक दिन
फिर सामने आओ तो बिफरने नहीं दूँगा
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सहरा है वतन मेरा गर्दिश में ठिकाना है
पर लोग इसे समझे ये तर्क-ए-ज़माना है

कुछ याद नहीं मुझ को क्या कार-ए-मोहब्बत था
जो पास है मेरे अब इक ज़ख़्म पुराना है

इक चाह थी जो मेरी मैं ने न कभी पाई
कहने को मगर फिर भी क़दमों में ज़माना है

मंसूब हुआ मतलब मैं दौर-ए-ज़माना से
हालात के आगे जब सर को ही झुकाना है

ये ज़ौक़ है बस मेरा तुम जिस को सुख़न समझे
इक नाम ही उस का बस लिख लिख के मिटाना है

अब कोई सुने दिल की ये अश्क मेरे पोंछे
कब तक ही यूँँही ख़ुद को हर बार मनाना है

बर्बाद करूँँ ख़ुद को ये शौक़ नहीं मेरा
ऐ दुश्मन-ए-जाँ तेरा पर हाथ बँटाना है

मैं अब भी दुआ-गो हूँ इक फ़र्ज़ निभाने को
मैं ने तो अभी अपने क़ातिल को बचाना है

अब फ़र्क़ नहीं पड़ता जा मैं ने इजाज़त दी
जिस नाम का भी तुझ को सिंदूर लगाना है

आसान समझते हो तुम शे'र कोई कहना
इक बात बतानी है इक राज़ छुपाना है

क्यूँँ छोड़ के जाते हो ऐ अहल-ए-सितम मुझ को
तुम ने तो अभी मुझ को तुर्बत में सुलाना है
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