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Top 10 of Owais Ahmad Dauran

Owais Ahmad Dauran

Top 10 of Owais Ahmad Dauran

    सहेली यूँँ तो कुछ कुछ साँवले से हैं मिरे साजन
    मगर तेरी क़सम बेहद रसीले हैं मिरे साजन
    जो मैं कहती हूँ उस को मुस्कुरा कर मान जाते हैं
    बहुत प्यारे बड़े ही भोले-भाले हैं मिरे साजन
    मैं उन से प्रेम करती हूँ भला मैं क्या बताऊँगी
    सखी तू बोल तुझ को कैसे लगते हैं मिरे साजन
    ब-ज़ाहिर वो दिखाई देते हैं मासूम दुनिया को
    मगर अंदर से मस्ताने रंगीले हैं मिरे साजन
    नहा धो कर मैं अपनी माँग जब सिंदूर से भरती हूँ
    तो जाने ज़ेर-ए-लब क्यूँँ मुस्कुराते हैं मिरे साजन
    खुले बालों की ख़ुशबू दिल को मतवाला बनाती है
    मिरा जूड़ा ये कह कर खोल देते हैं मिरे साजन
    छुपा लेती हूँ चेहरा उस घड़ी मैं लाज के मारे
    मुझे जब सेज पर अपनी बुलाते हैं मिरे साजन
    न मुझ से दिल सँभलता है न आँचल ही सँभलता है
    सुहाने गीत क्यूँँ रातों को गाते हैं मिरे साजन
    मुझे परदेस से हर बार गहना ला के देते हैं
    सहेली मुझ से बेहद प्यार करते हैं मिरे साजन
    कई दिन से मुसलसल देखती हूँ उन को सपने में
    पपीहे सच बता क्या आने वाले हैं मिरे साजन
    चमकता है मिरे माथे पे झूमर आज क्यूँँ जैसे
    ख़ुशी का चाँद बन कर घर में आए हैं मिरे साजन
    सवेरे से बहुत बेचैन हूँ घबरा रही हूँ मैं
    सखी परदेस में क्या जाने कैसे हैं मिरे साजन
    कोइलया! दिल में तेरी कूक अब नश्तर चुभोती है
    ज़माना हो गया है मुझ से बिछड़े हैं मिरे साजन
    घटा फिर झूम कर सावन की आई मोर फिर बोला
    मिरे साजन अब आ जाओ कि झूलें बाग़ में झूला
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    Owais Ahmad Dauran
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    मैं भूकी नस्ल हूँ
    मेरे मलूल ओ मुज़्महिल चेहरा पे
    ठंडी चाँदनी का अक्स मत ढूँडो
    मिरा बे-रंग-ओ-बू चेहरा
    जमी है अन-गिनत फ़ाक़ों की जिस पर धूल बरसों से
    ज़मीं के चंद फ़िरऔनों को अपनी ख़शमगीं नज़रों से तकता है
    मिरे अज्दाद भी
    मेरी तरह भूके थे लेकिन मुझ में और उन में
    ज़मीन-ओ-आसमाँ का फ़र्क़ है शायद
    वो अपनी भूक को तक़दीर का लिक्खा समझते थे
    क़नाअ'त उन का तकिया था
    तवक्कुल उन का शेवा था
    मगर मैं ऐसी हर झूटी तसल्ली का मुख़ालिफ़ हूँ
    मुक़द्दर के अँधेरों में नहीं
    मेरा यक़ीं है रौशनी-ए-सुब्ह-ए-फ़र्दा में
    मैं भूकी नस्ल हूँ
    मेरे लबों पर नाला-ओ-फ़रियाद की लय के एवज़
    इक आग है
    तेवर में ग़ुस्सा है
    ये वो ग़ुस्सा है जिस से
    मेरा दुश्मन थरथराता है
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    Owais Ahmad Dauran
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    रोने की उम्र है न सिसकने की उम्र है
    जाम-ए-नशात बन के छलकने की उम्र है
    शबनम की बूँद पी के चटकने की उम्र है
    गुलशन में फूल बन के महकने की उम्र है
    सद-मर्हबा ये गुमरही-ए-शौक़ चश्म-ओ-दिल
    हाँ राह-ए-आरज़ू में भटकने की उम्र है
    इक जुर्म है ख़याल-ओ-तसव्वुर गुनाह का
    ये उम्र सिर्फ़ पी के बहकने की उम्र है
    दीवाना बन के नज्द के सहरा में घूमिए
    लैला की जुस्तुजू में भटकने की उम्र है
    बेचैन क्यूँँ हो रूह किसी एक के लिए
    हर माह-वश पे जान छिड़कने की उम्र है
    इस दौर-ए-इम्बिसात में ब-हालत-ए-जुनूँ
    हर कू-ए-दिलबराँ में भटकने की उम्र है
    लाज़िम नहीं कि ख़ुद को बचाता फिरूँ तमाम
    शीशा हूँ चोट खा के दरकने की उम्र है
    तस्कीं वो दे रही हैं पर ऐ क़ल्ब-ए-ना-सुबूर
    तू और भी धड़क कि धड़कने की उम्र है
    जब चल पड़ा हूँ घर से तो मंज़िल की शर्त क्या
    हूँ रह-नवर्द-ए-शौक़ भटकने की उम्र है
    हूँ आफ़्ताब-ए-ताज़ा हुआ हूँ अभी तुलू'अ
    अपने जहान-ए-नौ में चमकने की उम्र है
    ऐवान ओ तख़्त-ओ-ताज हैं मेरी लपेट में
    शोला हूँ मैं ये मेरे भड़कने की उम्र है
    'दौराँ' मैं बज़्म-ए-दोस्त में छेड़ूँ न क्यूँँ ग़ज़ल
    ये ज़मज़
    में के दिन हैं लहकने की उम्र है
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    Owais Ahmad Dauran
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    दुबला पतला नाज़ुक 'दौराँ'
    शीशा जैसा नाज़ुक 'दौराँ'
    ग़म की काली रात का मारा
    अपने ही जज़्बात का मारा
    आठों पहर यूँँ खोया खोया
    जैसे गहरी सोच में डूबा
    कम हँसना आदत में दाख़िल
    ख़ामोशी फ़ितरत में दाख़िल
    शम्अ'' की सूरत बज़्म में जलना
    गाह भड़कना गाह पिघलना
    माथे पर हर वक़्त शिकन सी
    चेहरा पर आज़ुर्दा थकन सी
    चेहरे से महरूमी ज़ाहिर
    मासूमी मज़लूमी ज़ाहिर
    आँखें हर दम उमडी उमडी
    पलकें हर दम भीगी भीगी
    कर्ब आँखों में दर्द आँखों में
    राह-ए-वफ़ा की गर्द आँखों में
    सहमा सहमा शाम-ए-बला से
    रूठा रूठा अपने ख़ुदास
    अक़्ल-ओ-ख़िरद से जी को चुराए
    पागल-पन से बाज़ न आए
    जाने दिल में किस की लगन है
    रूह में किस काँटे की चुभन है
    ये है अपना 'दौराँ' यारो
    उलझा सुलझा 'दौराँ' यारो
    लेकिन यारो यही मुसाफ़िर
    राह-ए-वफ़ा का दुखी मुसाफ़िर
    शानों पर इक बोझ को लादे
    राह-ए-तलब में आगे आगे
    दिल में इक मज़बूत इरादा
    नज़रों में इक रौशन जादा
    ग़म की लंबी रात पे भारी
    ज़ुल्म का और ज़ुल्मत का शिकारी
    इंसानी तहज़ीब का क़ाइल
    दुनिया की ता'मीर पे माइल
    सई-ए-पैहम उस की तमन्ना
    जगमग जगमग उस का रस्ता
    उस की सारी फ़िक्र-ए-परेशाँ
    इंसानी तंज़ीम की ख़्वाहाँ
    नज़्में उस की जान-ए-मक़ासिद
    रूह-ए-तमद्दुन शान-ए-मक़ासिद
    सुब्ह पे शैदा शाम पे 'आशिक़
    अपने वतन के नाम पे 'आशिक़
    बातें रैब-ओ-रिया से ख़ाली
    हर नक़्श-ए-किरदार मिसाली
    प्यार इंसाँ का दिल में छुपाए
    दर्द-ए-जहाँ सीने में बसाए
    'दौराँ' है या रूह-ए-'दौराँ'
    गिर्यां गिर्यां ख़ंदाँ ख़ंदाँ
    इस की दुनिया अपनी दुनिया
    इस दुनिया में सारी दुनिया
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    Owais Ahmad Dauran
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    मिरे ना-रसा तसव्वुर ने सुराग़ पा लिया है
    मैं पता लगा चुका हूँ तू कहाँ कहाँ छुपा है

    मुझे कौन सर-बुलंदी की तरफ़ बुला रहा है
    मिरा नर्गिसी तख़य्युल तो शिकस्त खा चुका है

    तुझे क़ातिलों के नर्ग़े से छुड़ाएगा न कोई
    ये है मक़्तल ऐ मुसाफ़िर तू किसे पुकारता है

    सर-ए-शाम जो ग़रीबों के दिए बुझा रही हैं
    उन्हीं साज़िशों का मरकज़ ये तिरी महल-सरा है

    कोई मौसमी परिंदों से कहे इधर न आएँ
    अभी मेरे गुलिस्ताँ की बड़ी मुज़्महिल फ़ज़ा है

    सुन ऐ मेरी प्यारी दुनिया मिरी बे-क़रार दुनिया
    तिरा दर्द-मंद शाइ'र तिरे गीत गा रहा है

    वो ब-ज़ो'म-ए-ख़ुद गुलिस्ताँ का है सरबराह 'दौराँ'
    जो वो चाहे सो करेगा उसे कौन रोकता है
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    Owais Ahmad Dauran
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    तारीकी में दीप जलाए इंसाँ कितना प्यारा है
    राहें ढूँडे मंज़िल पाए इंसाँ कितना प्यारा है

    वक़्त-ए-मुसीबत आँसू पोंछे हमदर्दी की बात करे
    टूटे दिल को आस दिलाए इंसाँ कितना प्यारा है

    माँगे सौ सौ तरह मु'आफ़ी छोटी सी इक भूल की भी
    अपनी ख़ताओं पर शरमाए इंसाँ कितना प्यारा है

    दिल की धड़कन दिल में समोए गीत की लय ईजाद करे
    महफ़िल महफ़िल साज़ बजाए इंसाँ कितना प्यारा है

    लैला-ए-ख़ुद-आगाह की धुन में दामन फाड़े क़ैस बने
    सहरा सहरा ख़ाक उड़ाए इंसाँ कितना प्यारा है

    ले के हरीम-ए-नाज़ उस के शीरीं शीरीं नग़्मों को
    'दौराँ' की तौक़ीर बढ़ाए इंसाँ कितना प्यारा है
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    Owais Ahmad Dauran
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    ग़मगीं हैं दिल-फ़िगार हैं मेरे यहाँ के लोग
    दामान-ए-तार-तार हैं मेरे यहाँ के लोग

    पैदा किया है झूटे मसीहाओं ने जिसे
    उस दर्द के शिकार हैं मेरे यहाँ के लोग

    क्या जानिए हैं कब से जिगर सोख़्ता मगर
    इंसाँ के ग़म-गुसार हैं मेरे यहाँ के लोग

    गर्दन अगरचे ख़म है इता'अत के बोझ से
    लेकिन हरीफ़-ए-दार हैं मेरे यहाँ के लोग

    'दौराँ' इन्ही के ज़ख़्म से फूटेगी रौशनी
    माना कि सोगवार हैं मेरे यहाँ के लोग
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    Owais Ahmad Dauran
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    इन झिलमिलाते चाँद सितारों की छाँव में
    धी
    में सुरों में गाए जो बाबुल तो हम सुनें

    आँगन में तेरे फूल रही होगी कामनी!
    जी चाहता है आज बसेरा वहीं करें

    ये चाँद आज उगा है बड़ी आरज़ू के ब'अद
    आओ मय-ए-नशात पिएँ ग़म ग़लत करें

    अपनी सुहाग-रात कभी भूलतीं नहीं
    मेरे हसीं दयार की शर्मीली औरतें

    रंग-ए-हिना से सुर्ख़ रहीं उन की उँगलियाँ
    ऐ काश सारी उम्र वो दूल्हन बनी रहें

    प्यारे हैं आज हम भी बहुत देर से निढाल
    तुम भी थके हुए हो चलो आओ सो रहें

    जाने है कौन महव-ए-सफ़र आधी रात को
    जाने ये किस की दूर से आती हैं आहटें

    हम को बुला लिया करो बातें किया करो
    दिल में तुम्हारे दर्द के तूफ़ान जब उठें

    उफ़्तादगान-ए-राह के दिल पर लगेगी चोट
    मंज़िल पे जा के क़ाफ़िले आवाज़ यूँँ न दें

    तुम ने तमाम बाग़ को वीरान कर दिया
    ईंधन के ताजिरो ये पपीहे कहाँ रहें

    हर मरहला पे 'दौराँ' हमें उन की हो तलाश
    हर मंज़िल-ए-हयात पे उन का ही नाम लें
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    Owais Ahmad Dauran
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    चुप रहोगे तो ज़माना इस से बद-तर आएगा
    आने वाला दिन लिए हाथों में ख़ंजर आएगा

    वो लहू पी कर बड़े अंदाज़ से कहता है ये
    ग़म का हर तूफ़ान उस के घर के बाहर आएगा

    क्या तमाशा है डरे सह
    में हुए हैं सारे लोग
    क्या मिरी बस्ती में कोई ज़ालिम अफ़सर आएगा

    लौट कर पीछे कभी जाती नहीं रफ़्तार-ए-वक़्त
    ज़िंदगी को अब मिटाने कौन ख़ुद-सर आएगा

    मैं हूँ उस बज़्म-ए-हसीं का मुद्दतों से मुंतज़िर
    सब के हाथों में जहाँ लबरेज़ साग़र आएगा

    तुम इसी वादी में ठहरो इंतिज़ार उस का करो
    वो तुम्हारे पास इक पैग़ाम ले कर आएगा

    कूचा कूचा से उठेगी ग़म-ज़दों की एक लहर
    क़र्या क़र्या से बही-ख़्वाहों का लश्कर आएगा

    हाथ में मिशअल लिए हर सम्त पहरे पर रहो
    रात की चादर लपेटे हमला-आवर आएगा

    देख ऐ सय्याह मेरे देस की उजड़ी बहार
    इस से बढ़ कर भी कोई ग़मगीन मंज़र आएगा

    मेरी सुर्ख़ी-ए-तसव्वुर से हैं क्यूँँ नाराज़ आप
    क्या हरा पेड़ आप तक भी फूल ले कर आएगा

    ढल चली 'दौराँ' जवानी की चमकती दोपहर
    अब भला पहलू में मेरे कौन दिलबर आएगा
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    Owais Ahmad Dauran
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    रौनक़-ए-कूचा-ओ-बाज़ार हैं तेरी आँखें
    लोग सौदा हैं ख़रीदार हैं तेरी आँखें

    क्या यूँँही जाज़िब-ओ-दिलदार हैं तेरी आँखें
    ख़ालिक़-ए-हुस्न का शहकार हैं तेरी आँखें

    ये न होतीं तो किसी दिल में न तूफ़ाँ उठता
    शौक़-अंगेज़ ओ फ़ुसूँ-कार हैं तेरी आँखें

    तेरी मासूमियत-ए-दिल का पता देती हैं
    तेरी महबूबी का इक़रार हैं तेरी आँखें

    जाम-ओ-मीना की तरह ख़ुद ही छलक जाती हैं
    कितनी मख़मूर हैं सरशार हैं तेरी आँखें

    उन की तक़्दीस पे हो अज़्मत-ए-मर्यम भी निसार
    कौन कहता है गुनहगार हैं तेरी आँखें

    पलकें बोझल हैं मधुर नींद के मारे लेकिन
    जाने क्या बात है बेदार हैं तेरी आँखें

    जैसे सावन की घटा टूट के बरसे ऐ दोस्त
    आज कुछ ऐसे गुहर-बार हैं तेरी आँखें

    मेरे महबूब-ए-दिल-आवेज़ बता दे इतना
    मुझ से किस शय की तलबगार हैं तेरी आँखें

    हसरतें दिल में लिए डूब रहा है 'दौराँ'
    मौज-दर-मौज हैं मंजधार हैं तेरी आँखें
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    Owais Ahmad Dauran
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