Owais Ahmad Dauran

Owais Ahmad Dauran

@owais-ahmad-dauran

Owais Ahmad Dauran shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Owais Ahmad Dauran's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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ग़मगीं हैं दिल-फ़िगार हैं मेरे यहाँ के लोग
दामान-ए-तार-तार हैं मेरे यहाँ के लोग

पैदा किया है झूटे मसीहाओं ने जिसे
उस दर्द के शिकार हैं मेरे यहाँ के लोग

क्या जानिए हैं कब से जिगर सोख़्ता मगर
इंसाँ के ग़म-गुसार हैं मेरे यहाँ के लोग

गर्दन अगरचे ख़म है इताअत के बोझ से
लेकिन हरीफ़-ए-दार हैं मेरे यहाँ के लोग

'दौराँ' इन्ही के ज़ख़्म से फूटेगी रौशनी
माना कि सोगवार हैं मेरे यहाँ के लोग
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Owais Ahmad Dauran
मिरे ना-रसा तसव्वुर ने सुराग़ पा लिया है
मैं पता लगा चुका हूँ तू कहाँ कहाँ छुपा है

मुझे कौन सर-बुलंदी की तरफ़ बुला रहा है
मिरा नर्गिसी तख़य्युल तो शिकस्त खा चुका है

तुझे क़ातिलों के नर्ग़े से छुड़ाएगा न कोई
ये है मक़्तल ऐ मुसाफ़िर तू किसे पुकारता है

सर-ए-शाम जो ग़रीबों के दिए बुझा रही हैं
उन्हीं साज़िशों का मरकज़ ये तिरी महल-सरा है

कोई मौसमी परिंदों से कहे इधर न आएँ
अभी मेरे गुलिस्ताँ की बड़ी मुज़्महिल फ़ज़ा है

सुन ऐ मेरी प्यारी दुनिया मिरी बे-क़रार दुनिया
तिरा दर्द-मंद शाइर तिरे गीत गा रहा है

वो ब-ज़ो'म-ए-ख़ुद गुलिस्ताँ का है सरबराह 'दौराँ'
जो वो चाहे सो करेगा उसे कौन रोकता है
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Owais Ahmad Dauran
तारीकी में दीप जलाए इंसाँ कितना प्यारा है
राहें ढूँडे मंज़िल पाए इंसाँ कितना प्यारा है

वक़्त-ए-मुसीबत आँसू पोंछे हमदर्दी की बात करे
टूटे दिल को आस दिलाए इंसाँ कितना प्यारा है

माँगे सौ सौ तरह मुआफ़ी छोटी सी इक भूल की भी
अपनी ख़ताओं पर शरमाए इंसाँ कितना प्यारा है

दिल की धड़कन दिल में समोए गीत की लय ईजाद करे
महफ़िल महफ़िल साज़ बजाए इंसाँ कितना प्यारा है

लैला-ए-ख़ुद-आगाह की धुन में दामन फाड़े क़ैस बने
सहरा सहरा ख़ाक उड़ाए इंसाँ कितना प्यारा है

ले के हरीम-ए-नाज़ उस के शीरीं शीरीं नग़्मों को
'दौराँ' की तौक़ीर बढ़ाए इंसाँ कितना प्यारा है
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Owais Ahmad Dauran
रौनक़-ए-कूचा-ओ-बाज़ार हैं तेरी आँखें
लोग सौदा हैं ख़रीदार हैं तेरी आँखें

क्या यूँही जाज़िब-ओ-दिलदार हैं तेरी आँखें
ख़ालिक़-ए-हुस्न का शहकार हैं तेरी आँखें

ये न होतीं तो किसी दिल में न तूफ़ाँ उठता
शौक़-अंगेज़ ओ फ़ुसूँ-कार हैं तेरी आँखें

तेरी मासूमियत-ए-दिल का पता देती हैं
तेरी महबूबी का इक़रार हैं तेरी आँखें

जाम-ओ-मीना की तरह ख़ुद ही छलक जाती हैं
कितनी मख़मूर हैं सरशार हैं तेरी आँखें

उन की तक़्दीस पे हो अज़्मत-ए-मर्यम भी निसार
कौन कहता है गुनहगार हैं तेरी आँखें

पलकें बोझल हैं मधुर नींद के मारे लेकिन
जाने क्या बात है बेदार हैं तेरी आँखें

जैसे सावन की घटा टूट के बरसे ऐ दोस्त
आज कुछ ऐसे गुहर-बार हैं तेरी आँखें

मेरे महबूब-ए-दिल-आवेज़ बता दे इतना
मुझ से किस शय की तलबगार हैं तेरी आँखें

हसरतें दिल में लिए डूब रहा है 'दौराँ'
मौज-दर-मौज हैं मंजधार हैं तेरी आँखें
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Owais Ahmad Dauran
तुम्ही सरदार हो गुलशन के ये बतला देना
कोई हम-सर हो तो दीवार में चुनवा देना

मुतलक़-उल-हुक्म हैं सब इन दिनों घबराए हुए
ये ख़बर उस के हुज़ूर आज ही पहुँचा देना

सर उठाएगा ज़माना ये कहे देता हूँ
जूँही ऐसा हो उसे दार पर खिंचवा देना

मेरे तारीक मकाँ में उसे होगी तकलीफ़
ऐ सबा उस को गुलिस्ताँ ही में ठहरा देना

उस किसी चीज़ पे भूले से भी मचला न करे
मेरे 'दौराँ' दिल-ए-पुर-ख़ूँ को ये समझा देना
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Owais Ahmad Dauran
हर साँस को महकाइए अब देर न कीजे
इक फूल सा खिल जाइए अब देर न कीजे

इक जाम मोहब्बत से मसर्रत से भरा जाम
छलकाइए छलकाइए अब देर न कीजे

सच कहता हूँ इक उम्र से प्यासी है ये महफ़िल
पैमाना-ब-कफ़ आइए अब देर न कीजे

सावन की घटा बन के सुलगती हुई रुत में
दुनिया पे बरस जाइए अब देर न कीजे

ज़ंजीर में जकड़े हुए दीवानों को अपने
सूली से उतरवाइए अब देर न कीजे

सन्नाटा हर इक रूह को अब डसने लगा है
इक गीत कोई गाइए अब देर न कीजे

इस अहद-ए-शरर-बार पे फिर अम्न की शबनम
बरसाइए बरसाइए अब देर न कीजे

तलवारों ने चमकाया है मक़्तल की ज़मीं को
तलवारों को दफ़नाइए अब देर न कीजे

इक और हसीं ख़्वाब कि मिट जाए शब-ए-ग़म
'दौराँ' को भी दिखलाइए अब देर न कीजे
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Owais Ahmad Dauran
ख़ज़ाने भी मिलें इस के एवज़ तो हम न बेचेंगे
हमारा ग़म है मज़लूमों का ग़म ये ग़म न बेचेंगे

कुहिस्तानों से पत्थर काट कर लाएँगे हम लेकिन
किसी ज़ालिम के हाथों ज़ख़्म का मरहम न बेचेंगे

बला से धूल फाँकें या पुराने चीथड़े पहनें
मगर यारो मता-ए-इल्म-ओ-दानिश हम न बेचेंगे

किसी दरबार में जा कर अदब और फ़न की सूरत में
तुम्हारी अम्बरीं ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म न बेचेंगे

हमारा इंक़लाब आएगा जब तो काम आएगा
अभी अपनी तमन्ना का उजाला हम न बेचेंगे

गुलिस्ताँ बेच कर खाना हवस-कारों का शेवा है
चमन वालो पपीहों का तरन्नुम हम न बेचेंगे

भरी महफ़िल में 'दौराँ' आज हम फिर अहद करते हैं
जो है इंसानियत की आस वो परचम न बेचेंगे
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Owais Ahmad Dauran
पहले घिरे थे बे-ख़बरों के हुजूम में
अब आ गए हैं दीदा-वरों के हुजूम में

कुछ भी नहीं है उड़ती हुई राख के सिवा
क्या ढूँडते हो कम-नज़रों के हुजूम में

शहरों में आइनों के ख़रीदार ही नहीं
इक बे-कली है शीशा-गरों के हुजूम में

पहचान लीजे कौन है इंसाँ का रहनुमा
इन बे-शुमार राहबरों के हुजूम में

पैवंद की तरह नज़र आता है बद-नुमा
पुख़्ता मकान कच्चे घरों के हुजूम में

तेशा-ब-दस्त हर कोई रहता है रात दिन
हम दिल-जलों के बे-जिगरों के हुजूम में

'दौराँ' भी एहतिजाज ही करते हुए मिले
सड़कों पे गश्त करते सरों के हुजूम में
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Owais Ahmad Dauran
ऐ हम-नफ़सो! शब है गिराँ जागते रहना
हर लहज़ा है याँ ख़तरा-ए-जाँ जागते रहना

ऐसा न हो ये रात कोई हश्र उठा दे
उठता है सितारों से धुआँ जागते रहना

अब हुस्न की दुनिया में भी आराम नहीं है
है शोर सर-ए-कू-ए-बुताँ जागते रहना

ये सेहन-ए-गुलिस्ताँ नहीं मक़्तल है रफ़ीक़ो!
हर शाख़ है तलवार यहाँ जागते रहना

बे-दारों की दुनिया कभी लुटती नहीं 'दौराँ'
इक शम्अ लिए तुम भी यहाँ जागते रहना
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Owais Ahmad Dauran
इन झिलमिलाते चाँद सितारों की छाँव में
धीमे सुरों में गाए जो बाबुल तो हम सुनें

आँगन में तेरे फूल रही होगी कामनी!
जी चाहता है आज बसेरा वहीं करें

ये चाँद आज उगा है बड़ी आरज़ू के ब'अद
आओ मय-ए-नशात पिएँ ग़म ग़लत करें

अपनी सुहाग-रात कभी भूलतीं नहीं
मेरे हसीं दयार की शर्मीली औरतें

रंग-ए-हिना से सुर्ख़ रहीं उन की उँगलियाँ
ऐ काश सारी उम्र वो दूल्हन बनी रहें

प्यारे हैं आज हम भी बहुत देर से निढाल
तुम भी थके हुए हो चलो आओ सो रहें

जाने है कौन महव-ए-सफ़र आधी रात को
जाने ये किस की दूर से आती हैं आहटें

हम को बुला लिया करो बातें किया करो
दिल में तुम्हारे दर्द के तूफ़ान जब उठें

उफ़्तादगान-ए-राह के दिल पर लगेगी चोट
मंज़िल पे जा के क़ाफ़िले आवाज़ यूँ न दें

तुम ने तमाम बाग़ को वीरान कर दिया
ईंधन के ताजिरो ये पपीहे कहाँ रहें

हर मरहला पे 'दौराँ' हमें उन की हो तलाश
हर मंज़िल-ए-हयात पे उन का ही नाम लें
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Owais Ahmad Dauran
चुप रहोगे तो ज़माना इस से बद-तर आएगा
आने वाला दिन लिए हाथों में ख़ंजर आएगा

वो लहू पी कर बड़े अंदाज़ से कहता है ये
ग़म का हर तूफ़ान उस के घर के बाहर आएगा

क्या तमाशा है डरे सहमे हुए हैं सारे लोग
क्या मिरी बस्ती में कोई ज़ालिम अफ़सर आएगा

लौट कर पीछे कभी जाती नहीं रफ़्तार-ए-वक़्त
ज़िंदगी को अब मिटाने कौन ख़ुद-सर आएगा

मैं हूँ उस बज़्म-ए-हसीं का मुद्दतों से मुंतज़िर
सब के हाथों में जहाँ लबरेज़ साग़र आएगा

तुम इसी वादी में ठहरो इंतिज़ार उस का करो
वो तुम्हारे पास इक पैग़ाम ले कर आएगा

कूचा कूचा से उठेगी ग़म-ज़दों की एक लहर
क़र्या क़र्या से बही-ख़्वाहों का लश्कर आएगा

हाथ में मिशअल लिए हर सम्त पहरे पर रहो
रात की चादर लपेटे हमला-आवर आएगा

देख ऐ सय्याह मेरे देस की उजड़ी बहार
इस से बढ़ कर भी कोई ग़मगीन मंज़र आएगा

मेरी सुर्ख़ी-ए-तसव्वुर से हैं क्यूँ नाराज़ आप
क्या हरा पेड़ आप तक भी फूल ले कर आएगा

ढल चली 'दौराँ' जवानी की चमकती दोपहर
अब भला पहलू में मेरे कौन दिलबर आएगा
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Owais Ahmad Dauran
इस दौर ने बख़्शे हैं दुनिया को अजब तोहफ़े
घबराए हुए पैकर उकताए हुए चेहरे

कुछ दर्द के मारे हैं कुछ नाज़ के हैं पाले
कुछ लोग हैं हम जैसे कुछ लोग हैं तुम जैसे

हर गाँव सुहाना हो हर शहर चमक उठ्ठे
दिल की ये तमन्ना है पूरी हो मगर कैसे

बिफरी हुई दुनिया ने पत्थर तो बहुत फेंके
ये शीश-महल लेकिन ऐ दोस्त कहाँ टूटे

यूँही तो नहीं बहती ये धार लहू जैसी
इस बार फ़ज़ाओं से ख़ंजर ही बहुत बरसे

क्यूँ आग भड़क उट्ठी शाएर के ख़यालों की
ये राज़ की बातें हैं नादान तू क्या जाने

सौ बार सुना हम ने सौ बार हँसी आई
वो कहते हैं पत्थर को हम मोम बना देंगे

फिर गोश-ए-तसव्वुर में अब्बा की सदा आई
फिर उस ने दर-ए-दिल पे आवाज़ दी चुपके से

इस ख़ाक पे बिखरा है इक फूल हमारा भी
जब बाद-ए-सबा आए कुछ देर यहाँ ठहरे

अफ़्साना-नुमा कोई रूदाद नहीं मेरी
झाँका न कभी मैं ने ख़्वाबों के दरीचे से

मुश्किल है ये 'दौराँ' इस भीड़ को समझाना
मुड़ मुड़ के जो रहज़न से मंज़िल का पता पूछे
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Owais Ahmad Dauran
तुम आ गए हो जब से खटकने लगी है शाम
साग़र की तरह रोज़ छलकने लगी है शाम

शायद किसी की याद का मौसम फिर आ गया
पहलू में दिल की तरह धड़कने लगी है शाम

कुछ तू ही अपने ख़ून-ए-रमीदा की ले ख़बर
पलकों पे क़तरा क़तरा टपकने लगी है शाम

सहरा-ए-पुर-सुकूत में कुछ आहुओं के साथ
फिर किस की आरज़ू में भटकने लगी है शाम

क्या जाने आज क्यूँ किसी मज़दूर की तरह
सूरज ग़ुरूब होते ही थकने लगी है शाम

कुछ और आइना में सँवरने लगे हैं वो
जिस दिन से उन पे जान छिड़कने लगी है शाम

'दौराँ' सुना है सूरत-ए-गेसू-ए-अम्बरीं
इमसाल फिर चमन में महकने लगी है शाम
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