Vishal Khullar

Top 10 of Vishal Khullar

    आग का दरिया पार करे हो
    मौत का कारोबार करे हो

    हँसना मुश्किल रोना मुश्किल
    ख़ुद को यूँ लाचार करे हो

    आँखें खोलो साधू बाबा
    तर्क ये क्यूँ संसार करे हो

    दिल के बदले पागल हो क्या
    साँसों का ब्योपार करे हो

    'खुल्लर' जी तुम राह को अपनी
    दो-धारी तलवार करे हो
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    शिद्दत-ए-दर्द में एहसास का किरदार मियाँ
    अपने होने में कहाँ ख़ुद का है इज़हार मियाँ

    हम भी खो डाल रहे हैं कि बदल जाएँ ज़रा
    अक़्ल-ए-बेबस की सुने दिल नहीं तय्यार मियाँ

    ढूँड कुछ लोग मुक़ाबिल हूँ जहाँ मैं तेरे
    शहर-ए-नाक़िस में कहाँ हम से हैं ग़म-ख़्वार मियाँ

    गुनगुना बज़्म-ए-जहाँ शहद शकर शहद शकर
    बात रखते हैं लबों पर कि हैं औज़ार मियाँ

    झूट को झूट कहूँ सच को कहूँ सच लेकिन
    उलझती है मिरे सर कोई तलवार मियाँ

    आँख खोलूँ तो नज़र आएँ अँधेरे क्यूँ कर
    सब उजाले हैं मिरी नींद के बीमार मियाँ
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    लम्हा लम्हा शोर सा बरपा हुआ अच्छा लगा
    ख़ामुशी की तान टूटी वाहिमा अच्छा लगा

    आँखों आँखों में हुआ इक हादिसा अच्छा लगा
    मिलने वाले क्यूँ तुझे ये फ़ासला अच्छा लगा

    कौन जाने कौन बूझे दास्ताँ-दर-दास्ताँ
    कुछ हवा का कुछ दिए का हौसला अच्छा लगा

    जान की बाज़ी लगा दी भेद के खुलने तलक इश्क़ वालों को हमारा फ़ल्सफ़ा अच्छा लगा

    इक पहेली को मुसलसल सोचता हूँ तो मुझे
    बा-वफ़ा अच्छा लगा कि बे-वफ़ा अच्छा लगा

    लुत्फ़-ए-मंज़िल हौसलों से आ लगा था गाम गाम
    तू सफ़र में साथ था तो रास्ता अच्छा लगा

    उम्र की उक्ताहटें और दर्द के पहलू तमाम
    जब से 'खुल्लर' तू मिला है आइना अच्छा लगा
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    तिरी जब नींद का दफ़्तर खुला था
    यक़ीनन एक इक मंज़र खुला था

    उसे तुम चाँद से तश्बीह देना
    कि उस के हाथ में ख़ंजर खुला था

    सुना दीवार-ओ-दर क्या कह रहे हैं
    हमारी पीठ पर नश्तर खुला था

    नहीं कि तंग थीं अपनी क़बाएँ
    तुम्हारे जिस्म का पैकर खुला था

    बदलते मौसमों की तान टूटी
    घटाओं पर मिरा साग़र खुला था

    परी-पैकर से जब भी बात होती
    मज़े की बात है अक्सर खुला था

    किसी के हाथ सोए थे सिरहाने
    किसी के हाथ में ख़ंजर खुला था

    उड़ानें जब भी थीं महदूद 'खुल्लर'
    हमारे नाम का शह-पर खुला था
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    दीवार-ओ-दर सा चाहिए दीवार-ओ-दर मुझे
    दीवानगी में याद नहीं अपना घर मुझे

    तू था तो था वजूद में इक आइना मिरे
    अब ग़फ़लतों से मिलती है अपनी ख़बर मुझे

    पलकों पे नींद नींद में रखता है ख़्वाब फिर
    देता है दस्तकें भी वही रात-भर मुझे

    जी चल पड़ा ख़िज़ाओं की जानिब उदास शब
    ये लग गई बहार में किस की नज़र मुझे

    आबाद हो गए थे तिरे रास्ते जहाँ
    मिलता है उस गली में ही अपना नगर मुझे
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    एक लम्हा ठहर गया मुझ में
    वक़्त जैसे कि क़ैद था मुझ में

    कितने एहसास भर गया मुझ में
    रख गया कौन आइना मुझ में

    कितने सूरज नए उभर आए
    आसमाँ जब बिखर गया मुझ में

    सारे मंज़र मिरे इशारों पर
    बस गई है तिरी अदा मुझ में

    कौन सहरा में बस गया आ कर
    पेड़ उगने लगा घना मुझ में

    मैं कहाँ रात का मुसाफ़िर था
    चाँद ख़ुद आ के बस गया मुझ में

    ऐ हवा तेज़-गाम मत चलना
    जल रहा है कहीं दिया मुझ में
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    तेरे मिलने की दुआ की जाए
    दर्द की कुछ तो दवा की जाए

    ख़ामुशी ओढ़ रहा हूँ पल-पल
    ख़ाली बर्तन की सदा की जाए

    शाख़ ने ओढ़ लिए हैं पत्ते
    आओ ख़ुद पर भी क़बा की जाए

    चाँद को जिस से हया आती है
    जज़्ब क्या उस की अदा की जाए

    ख़ुश्क सहरा में कहाँ है पानी
    दफ़्न जंगल में अना की जाए
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    आग दरिया को इशारों से लगाने वाला
    अब के रूठा है बहुत मुझ को मनाने वाला

    मेरे चेहरे पे नई शाम खिलाने वाला
    जाने किस ओर गया बज़्म सजाने वाला

    नींद टूटे तो उसे देख के आऊँ मैं भी
    वो है आँखों में नए ख़्वाब सजाने वाला

    रात आँखों में कटी दिन को रही बेचैनी
    कैसा हमदर्द हुआ दर्द मिटाने वाला

    ज़र्द मौसम तो कहीं सख़्त क़वाएद जानाँ
    नग़्मा कुछ और नहीं दिल को दुखाने वाला

    अश्क आँखों से टपकते हैं बहुत 'खुल्लर'-जी
    उन में अब रंग भरो तुम ही ज़माने वाला
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    फिर उस रूप में आना तुम
    फिर से रास रचाना तुम

    महकों गुलशन गुलशन में
    मौसम पे छा जाना तुम

    फिर मैं अँधेरे ओढूँगा
    फिर इक दीप जलाना तुम

    बख़्शी तुम ने दिन को रात
    उजयारा भी लाना तुम

    जब मैं दूर चला जाऊँ
    मुझ को पास बुलाना तुम

    भटकूँ जंगल जंगल मैं
    शाख़ पे फूल खिलाना तुम

    'खुल्लर' मीठे बोल कहे
    डाली डाली गाना तुम
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    उस एक शख़्स का कोई पता नहीं मिलता
    कि उस के बा'द तो कुछ भी नया नहीं मिलता

    वो आइने से भी नज़रें चुरा रहा होगा
    कि उस का रूप ही उस से ज़रा नहीं मिलता

    वो धूप छाँव करे कहकशाँ बहार करे
    वो अर्ज़-ओ-तूल के अंदर बँधा नहीं मिलता

    वो जिस्म रूह ख़ला आसमान है क्या है
    कि रंग कोई हो उस से जुदा नहीं मिलता

    कभी कभी ही ख़ज़ाने नसीब होते हैं
    बना बनाया हुआ सब सदा नहीं मिलता

    बना तो रक्खा है मुंसिफ़ को अपना पहरे-दार
    वो अपने जुर्म से लेकिन रिहा नहीं मिलता

    काएनात ज़रा मुट्ठियाँ तो खोल कभी
    पता जो रखता हो मालिक तिरा नहीं मिलता
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