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Yameen shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Yameen's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Shayari
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  • Nazm
सँभल कर चल
बहुत गहरा अँधेरा है
तुम्हें ग़ारों में ऐसा ग़ार कम ही मिल सकेगा
यहाँ धरती नहीं कुछ आसमाँ सा है
दरख़्त इस नीली छत के साथ यूँँ चिपके हैं
जैसे ये इसी अंबर का हिस्सा हों
कई दिन से ये सब नीले दरख़्त इस आसमाँ से उग रहे हैं
अभी मैं तुम से क्या कहने लगा था
सँभल कर
हाँ मुझे कहना था
कि उस ग़ार से निकलें तो शायद आसमाँ से हम ज़मीं देखें
मगर हम तो ज़मीं पर थे
ये कैसे आसमाँ पर आ गए हैं
ख़ला तो इस ज़मीं पर भी बहुत है
मगर हम आसमाँ उस को नहीं कहते
ज़मीं तो आसमाँ पर भी बहुत है
मगर हम इस को धरती कैसे कह दें
चलो उस ग़ार से हो कर निकलते हैं किसी जानिब
सँभल कर
हाँ सँभल कर चल
यहाँ पर रौशनी इतनी ज़ियादा है
कि आँखों में अँधेरा भर गया है
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मगर हम ने देखा
कि वीरान घाटी का दामन भरा था
बहुत सारी चीज़ें
हवाओं के पाँव से उलझी हुई थीं
दु'आओं की
ख़ाली और औंधी पड़ी शीशियाँ
और टूटी हुई पंजगाना नमाज़ें
नवाफ़िल-ओ-सियाम की सख़्त ढालें
मसाजिद के रस्तों में तोड़ी गई
जूतियों
और क़दम-दर-क़दम
नेकियों की क़तारें
वज़ाइफ़-ओ-दरूद-ओ-मुनाजात के
इक रिबन में बंधे
ख़ुदावंद-ए-आलम की रस्सी के टुकड़े
और ऐसी बहुत सारी चीज़ें
ख़ुदा की ख़ुदाई में बिखरी हुई थीं
कि जैसे यहाँ
रात ठहरे हुए कारवाँ को
अब उन की ज़रूरत न थी
कि बख़्शिश का ख़ाली कनस्तर
बहुत भर गया था
मगर नेक नामों की फेंकी हुई
बहुत सारी चीज़ों के
इस ढेर में
कोई हम सेाए का दर्द
उस पर बहाएा गया गर्म आँसू नहीं था
कोई भूक को काटने वाला दिलदार चाक़ू नहीं था
सख़ावत का ख़ामोश हाथ
और शक़ावत पे उठता हुआ कोई बाज़ू नहीं था
बहुत सारी चीज़ें थीं
लेकिन कहीं भी तराज़ू नहीं था
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सुन के भी चुप ही रहा
तल्ख़ बातें मुश्क-बार अफ़्ग़ानी क़हवे के
रसीले घूँट में घुल-मिल गईं
ये हक़ीक़त और थी कि बाप दादा क़िस्सा-गो मशहूर थे
इस लिए वो चुप रहा

तारीख़ के नक़्शे में
जिन शहरों की शोहरत गूँजती है
वो ख़मोशी के इस अज़ली रंग से ज़ाहिर हुए
जिस से शनासाई नहीं है
इस हुजूम-ए-शोर-ओ-शर की

उस ने सोचा
याद-गारी चौक में चारों तरफ़
ये बोलते बाज़ार हैं
इस लिए अफ़्सुर्दगी में गुम खड़े
उस बेद-ए-मजनूँ पर
नज़र पड़ती नहीं
जो अकेला रह गया है क़िस्सा-ख़्वानों में यहाँ
बे-रंग उखड़ती छाल पर
चाक़ू से कंदा नाम फीका पड़ गया है
कंदा-कारी जा मिली है ख़ाक से
वक़्त की ग़फ़लत ने क्या साबित किया
ज़ख़्म खाने और लगाने वालों में
कौन फ़तह-याब हैं

शीरीं-गुल!
आगे सुना
क्या सब्ज़ आँखों में भी ख़ाकी ख़्वाब हैं
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वो बर्फ़ानी रात
बादाम अख़रोट और सत्तू
सरमा का शहद और साग की ख़ुशबू
और इक लोक कहानी में गुम
आग के गिर्द
मैं और तुम

आओ चलें
चर्ख़े की आवाज़ में डूबी
उस बस्ती में
शाम जहाँ पर ऐसे उतरे
जैसे किसी बीमार बदन में
जीवन-रस

बर्फ़ की रुत का पहला दिन
कितना सफ़ेद और आज़ुर्दा है
दरिया अपनी मजबूरी का गदला पानी
और हमारी नादारी के
आँसू अपनी पुश्त पे रक्खे रेंग रहा है
और सड़क पर
बरसों पुराने लोग निकल कर चलते हैं
उन की आँखें
एक पुरानी याद से बोझल
और चेहरों पर
कोई गहरा ख़ौफ़ जमा है
धानी घास के जूतों में ये
अपने जलते पाँव पहन कर
और होंटों पर
हिज्र के गीतों को सुलगा कर
नए सफ़र पर निकले हैं

आओ चलें
उन गलियों की दुश्वारी में
जो पंजाबी और हाजी पीर के अंदर खुलती हैं
जिन के पार
एक अलाव सा जलता है
जिन में चलने वाला जैसे
गहरे ख़्वाब में चलता है
आओ चलें
और चल कर देखें
जिस्म के दाग़ और रूह के सोग
आग जलों ने कब देखे हैं
बर्फ़ में जलते लोग
लोग
जिन्हों ने
बर्फ़-रुतों का विर्सा पाल के
किस जोखिम से
माह-ओ-साल के
अंदर रहना सीख लिया था
उन पर कैसा वक़्त पड़ा है
आओ चलें और
एक सवाल की शम्अ' जला कर
उस बर्फ़ानी रात में उतरें
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